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________________ जीव-विज्ञान आपके कहने में बेचारे आ जाते हैं। लेकिन उनके अंदर की जो भावात्मक परिणति है वह आपको इस प्रकार के सूत्रों पर श्रद्धान करने से समझ आएगी। यह बहुत बड़ा जीव-विज्ञान है जो हमें बताता है कि मन का विज्ञान अलग है और भावों का विज्ञान अलग है। इन जीवों का जो संचालन चलता है वह भाव-विज्ञान से चलता है और आपका जो संचालन होता है वह सब मनोविज्ञान से होता है। इसलिए आपके लिए मनोविज्ञान अलग से बनाना पड़ा। Psychology, Psychologist | जैसे पहले सर्जरीकल डॉ. होते थे तो वे सर्जरी करते थे, ऐसे ही अब मन को संभालने वाले अलग से Psychologist होते हैं। उनको अलग से एक ट्रेनिंग दी जाती है, एक अलग से मनोविज्ञान Develope हुआ है मन वालों के लिए। यह मन है जिसकी सहायता से हमारा सम्पूर्ण जीवन चलता है। इसलिए आप समनस्क जीव हैं। भाव प्रणाली तक आपकी परिणति नहीं पहुँचती। इसलिए आचार्यों को कहना पड़ता है कि आप अपने विचारों से मुक्त होकर अपने भावों को देखें, अपने भावों तक अपना स्पर्श करें। क्योंकि आप अपने भावों तक पहुँच नहीं पा रहे हो। इसलिए कहने में आ जाता है भैया अच्छे भाव बनाओ। अच्छे भाव कैसे बनेंगे? तो पहले मन सामने आएगा, फिर विचार सामने आ जाएगा। पहले अच्छे विचार बनाओ, जब अच्छा विचार बनेगा तो वह आपको भाव तक ले जाएगा और आपके अन्दर अच्छा भावात्मक परिणाम आएगा। तो आप एक तरीके से पराश्रित भी हो गए और अगर आप थोड़ी समझदारी से कार्य करें तो आप बहुत ज्यादा स्वाश्रित भी हो जाएंगे। पराश्रित इसलिए क्योंकि हम मन के आश्रित हो गए और लाभ यह है कि मन ही समझ सकता है और मन को यदि कोई विषय समझ आ जाए तो आपको उन अमनस्क जीवों से ज्यादा सुख मिल सकता है। क्योंकि उनके पास में तो सुख की प्राप्ति का कोई आभास नहीं है। आप अपने मन से उस सुख की प्राप्ति कर सकते हैं। इसलिए समनस्कों को पहले लिखा गया है। किसलिए? क्योंकि ये बड़े लोग हैं बड़े लोगों को पहले रखना पड़ता है। ये मन वाले हैं, इनको पहले लिखा गया है। इसका भी एक कारण है। संसारी और मुक्त जीवों में संसारी को क्यों रखा गया?क्योंकि उनकी संख्या ज्यादा है। जिनका बहुमत है उनको आगे रखना पड़ता है। ये भी इन सूत्रों के बड़े-बड़े भाव हैं। आचार्य यह भी लिख सकते थे 'अमनस्क/समनस्क' परन्तु नहीं, आचार्य जी ने लिखा, “समनस्कामनस्का" क्योंकि समनस्क वालों का सबसे बड़ा उपयोग है, उनका काम है, वे बड़े हैं, क्योंकि वे अपने मन का उपयोग करेंगे। अमनस्क क्या है, अगर अमनस्कों को पहले रख देंगे तो वे कैसे समझेंगे समनस्क क्या हैं? इसलिए आप बड़े हैं; समनस्क हैं, इसलिए आपको पहले रखा गया है। इसी क्रम में आचार्य संसारी जीव के अन्य प्रकार से भेद कहते हैं संसारिणस्त्रसस्थावराः।। 12|| अर्थ संसारी जीव त्रस और स्थावर के भेद से दो प्रकार के हैं। जिसके त्रस नामकर्म का उदय होता हैं वह जीव त्रस कहलाता है, जिसके स्थावर नामकर्म का उदय होता है वह जीव स्थावर कहलाता 37
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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