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________________ जीव-विज्ञान बना रहता है यही उनका क्षायिकलाभ है। यह क्षायिक लाभ सिद्धों में घटित नहीं होगा क्योंकि यह लाभ शरीर के साथ है, और शरीर उनका छुट गया अर्थात् सिद्धों के शरीर नहीं होता तो वहाँ पर यह चीज शक्ति के रूप में है। क्षायिकलाभ के कारण उनके शरीर में कोई परेशानी नहीं आती, उन्हें शरीर सम्बन्धी कोई रोग नहीं होता। और वर्षों तक जितनी उनकी आयु बची हुई है तब तक बिना कुछ खाये-पिये उनके शरीर में कांति बनी रहती है यह इसी क्षायिकलाभ के कारण से होता है। एक उदाहरण से आप समझ सकते हैं भगवान महावीर को 42 वर्ष की आयु में केवलज्ञान प्राप्त हुआ और 72 वर्ष की आयु में मोक्ष की प्राप्ति हुई अर्थात् 30 वर्ष तक उन्होंने न कुछ खाया और न कुछ पिया, फिर भी उनका शरीर एकदम चमकदार बना रहा। इसी क्षायिकलाभ के कारण से उनका शरीर वैसा का वैसा बना रहा। - इसके बाद आता है क्षायिक भोग और क्षायिक उपभोग। ये भी शरीर-सम्बन्धी होते हैं। अब इस भोग और उपभोग से उन्हें कोई काम नहीं है। क्योंकि उन्हें तो अपने अन्तरंग के अनन्त सुख का भोग करना है और उसी का उपभोग करना है। बाहरी चीजें हैं जो हमारी दृष्टि में, देखने में आती है जैसे- भगवान के सामने पुष्पवृष्टि हो रही है, जब तक वह समवशरण में रहेंगे तब तक अनेक प्रकार की सुगन्धित पुष्प-वृष्टि और जल-वृष्टि होती रहेगी। यह उनका क्षायिकभोग कहलायेगा। जो चीजें एक बार भोगने में आये उसे कहते हैं-भोग और जो बार-बार भोगने में आये उसे कहते हैं-उपभोग। क्षायिक-उपभोग से तात्पर्य है जैसे भगवान के नीचे रखा हुआ सिंहासन जो हर क्षण तो बदला नहीं जाएगा, उनके ऊपर लगे तीन छत्र, ये सब उनके उपभोग हैं। भगवान इन भोग और उपभोग के बीच में रहते हुए भी, उनका इनके प्रति न कोई राग का भाव रहता है और न अनुराग का भाव रहता है। क्षायिक-वीर्य का अर्थ है-उन्हें अनन्त शक्तियाँ प्राप्त हो गई हैं। उस अनन्त शक्ति के माध्यम से ही अनन्तज्ञान द्वारा पदार्थों को वह जान सकेंगे। क्योंकि ज्ञान का शक्ति के साथ सम्बन्ध है। यदि आपके पास बहुत ज्ञान है और शक्ति कम है तो आप उसका उपयोग नहीं कर पाओगे। उदाहरण के लिए आपके wire में voltage तो बहुत ज्यादा आ रहा है लेकिन उस wire में उस voltage को सहन करने की क्षमता नहीं है तो वह wire फूंक जाएगा। ऐसे ही ज्ञान से हम बहुत कुछ जानना चाहते हैं लेकिन हमारी आत्मा में शक्ति नहीं होगी तो उस ज्ञान से हम जान नहीं पाएंगे। इसलिए भगवान में जैसे ही क्षायिकज्ञान उत्पन्न हो जाता है वैसे ही क्षायिक- शक्ति भी उत्पन्न हो जाती है। इसलिए इस सूत्र के माध्यम से हम यह जान सकते हैं कि जितना हमारे पास ज्ञान है, उतनी ही हमारे अन्दर शक्ति है। ये शक्ति तो बहुत छोटी है और जो केवली भगवान के पास, अरिहन्त और सिद्ध भगवान के पास शक्तियाँ हैं, ये शक्तियाँ तो अनन्त हैं इसलिए इनको क्षायिकभाव में रखा गया है। ये सब भाव उस आत्मा में अनन्त काल तक बने रहते हैं जो आत्मा एक बार इन भावों को प्राप्त कर लेती हैं। -16
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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