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________________ जीव-विज्ञान शंका- संख्यात और असंख्यात और अनन्त से तात्पर्य क्या है? समाधान-संख्यात संख्या वह होती है जो हम अपने मतिज्ञान, श्रुतज्ञान से गिन सकते हैं।। असंख्यात संख्या वह है जो हमारे ज्ञान से गिनने में नहीं आएगी, जो अवधिज्ञानियों के द्वारा गिनने में आएगी वह असंख्यात है,और जो केवलज्ञानियों द्वारा गिनने में आएगी वह अनन्त है। प्रश्न -लब्धि किसे कहते हैं? उत्तर – हमारी उपलब्धि, Achievement हमें जो कुछ प्राप्त हुआ है उसे लब्धि कहते हैं। क्षायोपशमिक-भाव के अट्ठारह भेदज्ञानाज्ञान-दर्शन-लब्धयश्चतुस्त्रि-त्रि-पंचभेदाः सम्यक्त्व-चारित्र-संयमासंयमाश्च।। 5 ।। अर्थ-मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय ये चार ज्ञान, कुमति, कुश्रुत, कुअवधि ये तीन अज्ञान, चक्षु इन्द्रिय के द्वारा पदार्थों का सामान्य ग्रहण रूप चक्षुदर्शन, शेष इन्द्रियों के द्वारा पदार्थों का सामान्य ग्रहण रूप अचक्षुदर्शन, अवधिज्ञान से पहले होने वाला सामान्य ग्रहण रूप अवधिदर्शन ये तीन दर्शन, अंतराय कर्म के क्षयोपशम के कारण होने वाला दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य ये पाँच लब्धियाँ, क्षायोपशमिक सम्यक्त्व, सरागचारित्र और संयमासंयम (देशव्रत) ये अठ्ठारह क्षायोपशमिक भाव हैं। __ इस सूत्र में क्षायोपशमिक-भावों के भेदों का वर्णन किया जा रहा है। सबसे पहले ज्ञान के विषय में बताया जा रहा है। पहले वाले सूत्र में जिस ज्ञान के विषय में बताया गया था वह क्षायिक ज्ञान था और यहाँ जिस ज्ञान के बारे में बताया जा रहा है वह क्षयोपशमिक ज्ञान है। इस तरह से हमें ध्यान रखना चाहिये ज्ञान भी दो प्रकार का होता है। एक क्षायिकज्ञान और दूसरा क्षयोपशम-ज्ञान। यहाँ क्षयोपशमज्ञान का वर्णन है तो इसी को हमें समझना है। इसी तरह से एक अज्ञान भी है, यह अज्ञान भी क्षयोपशमज्ञान में आता है। इसके बाद दर्शन में भी क्षयोपशम भाव होता है। दर्शन का अर्थ है जो चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शन है ये क्षयोपशम भाव वाले दर्शन कहलाते हैं। इनके भेद भी आगे इसी अध्याय में मिलेंगे। आगे क्षायोपशमिक-लब्धि है इनको इसी क्रम में लगाना है। सबसे पहले लिखा हुआ है चतुः अर्थात् जो क्षायोपशमिक ज्ञान है वह चार प्रकार का है। आपने पढ़ा होगा पाँच ज्ञान होते है। मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यय और केवलज्ञान। केवलज्ञान तो हो गया क्षायिकज्ञान जिसका वर्णन पहले सूत्र में किया जा चुका है। अब यहाँ पर जो चार ज्ञान हैं जो हैं-क्षायोपशमिक ज्ञान। अब आता है त्रि-त्रि का अर्थ-तीन अज्ञान होते हैं। ये मिथ्याज्ञान रूप अज्ञान है अर्थात् मिथ्यात्व के साथ में तीन ज्ञान अज्ञान रूप परिणमन कर जाते हैं। मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान ये ज्ञान मिथ्या के साथ भी रहते हैं। जब ये मिथ्याज्ञान होंगे तो इनका नाम बदल जाता है, इनके - 17
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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