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________________ जीव-विज्ञान भगवान अनन्त को जानेंगे और देखेंगे, परन्तु क्षायिकदान से वे क्या दान देंगे? तो आचार्य कहते हैं कि वह हम सभी जीवों के लिए अभयदान दे रहे हैं। अनन्त जीव उस अभयदान को प्राप्त कर चुके हैं, कर रहे हैं और करते रहेंगे। अरिहन्त अवस्था में रहेंगे तब भी वे अभयदान देंगे और सिद्ध भी बन जाएंगे तब भी वह अभयदान देंगे। प्रश्न- अभयदान क्या होता है? उत्तर- उनकी शरण में जो आएगा उसे किसी भी प्रकार का भय नहीं रहेगा। आप अरिहन्त भगवान की शरण में हैं, सिद्ध भगवान की शरण में हैं तो आपमें एकदम निर्भीकता आ जाएगी। यह उनका अभयदान हुआ । जैसे ही आप उनकी शरण में आओगे वह आपको अभयदान प्रसारित करेंगे, आपके पास अभयदान पहुँच जाएगा। इसके लिए आपको उनसे जुड़े रहना है, उन पर श्रद्धा रखनी है। हमें उनसे सम्बन्ध तो जोड़ना ही पड़ेगा क्योंकि बिना जुड़े तो कुछ भी होने वाला नहीं है। हम चाहते हैं हमें बिना जुड़े सब कुछ मिलता रहे -ऐसा तो नहीं हो सकता। भगवान का ध्यान करने से, उन पर श्रद्धा रखने से हमें किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता है। मान लो, हमने अरिहन्त भगवान का ध्यान किया। उनका ध्यान करने से हमारे परिणामों में विशुद्धि आई तो यह अरिहन्त भगवान का अभयदान हुआ, इस चीज को हम कभी नहीं समझते। जैसे सिद्ध भगवान का ध्यान करते-करते हमारे परिणामों में उपशमन भाव आ गया, कर्म उपशमित हो गये तो हमें औपशमिक सम्यग्दर्शन प्राप्त हो गया, यह भगवान का दिया हुआ दान है। अभी तक हम यही सोचते हैं कि भगवान कुछ देते नहीं और वीतराग भगवान की बात आने पर तो लोग और कह देते हैं कि वीतराग भगवान तो कुछ देते नहीं हैं और वे अन्य-अन्य जगहों पर भागने लग जाते हैं। हमें ये बातें भी लोगों को बतानी चाहिए कि जो हमें अरिहन्त और सिद्ध भगवान दे सकते हैं, वह हमें अन्य कहीं नहीं मिल सकता है और न कोई दे सकता है। क्योंकि अरिहन्त और सिद्ध भगवान का ध्यान करने से हमारे कर्मों का उपशमन होगा, हमारे परिणामों में विशुद्धि आएगी और हमें अत्यन्त शान्ति मिलेगी। इसलिए अरिहन्त और सिद्ध भगवान भी दान देते हैं। इस सिद्धान्त से सिद्ध हो जाता है कि भगवान भी क्षायिक-दाता है उनसे बड़ा दाता कोई भी नहीं है। ऐसे ही भगवान को लाभ भी हो रहा है। अरिहन्त भगवान को लाभ किस रूप में होगा? आचार्य कहते हैं-उन्हें अपने लाभ अन्तराय कर्म के क्षय से ऐसा लाभ होता है कि जब तक वह अरिहन्त अवस्था में शरीर के साथ रहेंगे तब तक उनके शरीर में जितनी भी शुद्ध, सूक्ष्म, सुंदर, मधुर वर्गणाएं है वे सब उनको प्राप्त होती रहेंगी जो उनके शरीर को वैसा का वैसा ही बनाये रखने में कारण बनेगी। कहने का तात्पर्य है कि भगवान का शरीर बिना कुछ खाए-पिये कई वर्षों तक वैसा का वैसा ही बना रहेगा। अरिहन्त भगवान की जितनी भी आयु बची है उस आयु-काल में अरिहन्त बनने के बाद वह कभी भोजन नहीं करते हैं। अरिहन्त बनने के बाद उनका शरीर वैसा का वैसा 15
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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