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________________ ८६ में जिनशेखरसूरि का अस्तित्व ही था। कारण, खरतरगच्छ की पट्टावली में जिनशेखरसूरि का समय वि. सं. १२०५ का लिखा है। अतः यह लेख खरतरों ने खरतर शब्द को प्राचीन बनाने के लिये जाली छपाया है। इसी प्रकार जैतारण की मूर्तियों के लेख भी कल्पित हैं। चोर चोरी करता है पर उसमें कहीं न कहीं चोरी पकड़ी जाने के लिये त्रुटि रह ही जाती है। उपरोक्त शिलालेखों में चतुर्थ शिलालेख ११६७ का है जब जिनदत्तसूरि को सूरि पद वि. सं. ११६९ में हुआ था? उसके पूर्व जिनदत्त का नाम सोमचन्द्र था। जब जिनदत्त नाम का जन्म ही ११६९ में हुआ तो ११६७ के शिलालेख में जिनदत्त का नाम आ ही कैसे सकता था? क्योंकि जन्म के पूर्व नाम हो ही नहीं सकता है। अतः पूर्वोक्त सब लेख जाली एवं कल्पित हैं। इन लेखों की लिपि की ओर दृष्टिपात करने से साफ साफ मालूम होता है कि यह लिपि बारहवीं शताब्दी की नहीं पर सत्रहवीं शताब्दी की है कि जिस समय महोपाध्यायजी धर्मसागरजी और जिनचन्द्रसूरि की आपस में खरतर शब्द की उत्पत्ति के विषय में खूब द्वन्द्वता चल रही थी। उस समय जिनचन्द्रसूरि ने भविष्य में खरतर शब्द को प्राचीन सिद्ध करने के लिये इस प्रकार नीच कर्म किया है। पर उस समय जिनचन्द्र को यह विश्वास नहीं था कि आगे चल कर एक जमाना ऐसा आवेगा कि लिपि शास्त्र के जानकार सौ सौ वर्ष की लिपियों को पहचान कर जाली लेखों के पर्दे चीर डालेंगे। भला जिनदत्तसूरि ने जैसे मूर्तियों की प्रतिष्ठा करवाई है वैसे कोई ग्रन्थ भी निर्माण किया है। दो पंक्तियों के शिलालेख में तो उन्होंने अपने को सुविहित खरतरगच्छे गणाधीश होना लिख दिया, तब उनके ग्रन्थों की लम्बी चौड़ी प्रशस्तियों में खरतर शब्द की गन्ध तक भी नहीं। इतना ही क्यों पर उनके पीछे जिनचन्द्र और जिनपति के ग्रन्थों में भी खरतर शब्द की बू तक न मिले। यह सत्रहवीं शताब्दी के जिनचन्द्र की काली करतूतों को स्पष्ट सिद्ध जाहिर कर रही हैं। अतः उसके खुदाये हुए जाली शिलालेखों से खरतर शब्द प्राचीन नहीं पर अर्वाचीन ही सिद्ध होता है। क्योंकि जो व्यक्ति झूठा होता है वही ऐसा नीच कर्म करता है। मेरी लिखी खरतरमतोत्पत्ति भाग १-२ के प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि खरतर शब्द गच्छ के रुप में विक्रम की चौदहवीं शताब्दी से लिखा जाना शुरु हुआ है। इसके पूर्व यह अपमान के रुप में ही समझा जाता था। क्योंकि जिनदत्तसूरि की प्रकृति से पैदा हुआ बारहवीं शताब्दी का खरतर शब्द चौदहवीं शताब्दी तक गुप्त रुप में रहे, इसका कारण यही हो सकता है कि यह अपमानसूचक शब्द था कि किसीने इसको नहीं अपनाया था।
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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