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________________ ८५ wwwwwwwwwwwwwwwar संघुत्ति भयपलाणो, पट्टणओ उट्टवाहणारूढ़ो । पत्तो जावलीपुरं, जणकहणे भणइ विज्जाए ॥ ३६ ॥ इस प्रकार जिनवल्लभसूरि के 'विधिमार्ग' मत का नाम जिनदत्तसूरि की खर प्रकृति के कारण खरतर हुआ है। फिर भी उस समय यह खरतर नाम अपमानसूचक होने से किसी ने भी नहीं अपनाया था। हां बाद दिन निकल जाने से जिनकुशलसूरि के समय उस अपमानसूचक खरतर शब्द को गच्छ के रुप में परिणित कर दिया। बस उस दिन से यह खरतर शब्द गच्छ के साथ चिपक गया जैसे लोहे के साथ कीटा चिपक जाता है। प्रश्न-यदि खरतर शब्द की उत्पत्ति जिनदत्तसूरि की खर प्रकृति से हुई होती और यह शब्द अपमान के रुप में होता तथा इस खरतर शब्द से जिनदत्तसूरि सख्त नाराज होता तो जिनदत्तसूरि की कराई हुई प्रतिष्ठावाली मूर्तियों के शिलालेखों में खुद जिनदत्तसूरि अपने को 'खरतरगच्छ सुविहित गणाधीश' क्यों लिखते? जैसे जैतारन ग्राम में कई मूर्तियां जिनदत्तसूरि की प्रतिष्ठा करवाई हुई आज भी विद्यमान हैं और उन मूर्तियों पर शिलालेख भी खुदे हुये मौजूद हैं। देखिये नमूने के तौर पर कतिपय शिलालेख। "सं. ११७१ माघ शुक्ल ५ गुरौ सं. हेमराजभार्यहेमादे पु. सा. रुपचन्द रामचन्द्र श्रीपार्श्वनाथ विव करापितं अ. खरतर गच्छे सुविहित गणाधीश श्री जिनदत्तसूरिभिः" ___“सं. ११७४ वैशाख शुक्ला ३ सं. म............भार्यहेमादें पु....... चन्द्रप्रभविव ........ प्र. खरतर गच्छे सुविहित गणाधीश श्री जिनदत्तसूरिभिः" "सं. ११८१ माघ शुक्ल ५ गुरौ प्राग्वट ज्ञातिय सं. दीपचन्द्र भार्य दीपादें पु. अबीरचन्द्र अमीचन्द्र श्री शान्तिनाथ बिंब करापितं प्र. खरतर गच्छे सुविहित गणाधीश्वर श्रीजिनदत्तसूरिभिः" । “सं. ११६७ जेठ वदी ५ गुरौ स. रेनुलाल भार्य रत्नादें पु. सा. कुनणमल श्रीचन्द्रप्रभ विंव करापित प्र. सुविहित खरतर गच्छेगणाधीश्वर श्रीजिनदत्तसूरिभिः" इनके अलावा जैसलमेर के शिलालेखों में सं. ११४७ के शिलालेख में खरतर गच्छे जिनशेखरसूरि का नाम आता है तथा और भी किसी स्थान पर ऐसी मूर्तियां होगी। अतः इन शिलालेखों से पाया जाता है कि खरतर शब्द की उत्पत्ति जिनदत्तसूरि से नहीं पर आपके पूर्ववर्ती आचार्य जिनेश्वरसूरि से ही हुई होगी। उत्तर-११४७ की मूर्ति एवं शिलालेख के लिये तो मैंने प्रथम भाग में समालोचना कर दी थी कि न तो जैसलमेर में ११४७ वाली मूर्ति है और न ११४७
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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