SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 50
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५० ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ बाद चातुर्मास के विहार कर धारा नगरी की ओर पधार गये। अब आगे चलकर देखिये इससे मिलता हुआ एक प्रमाण खास खरतरों के घर का है जिसको यहां उद्धृत कर दिया जाता हैवच्छा ! गच्छह अणहिल्लपट्टणे संपयं जओ तत्थ । सुविहिअजइप्पवेसं चेइअमुणिणो निवारिंति ॥१॥ सत्तीए बुद्धिए सुविहिअसाहूण तत्थ य पवेसो । कायव्वो तुम्ह समो अन्नो न हु अत्थि कोऽवि विऊ ॥२॥ सीसे धरिऊण गुरुणमेयमाणं कमेण ते पत्ता ।। गुज्जरधरावयंसं अणहिल्लभिहाणयं नगरं ॥ ३ ॥ गीअत्थमुणिसमेया भमिआ पइमंदिरं वसहिहेऊ । सा तत्थ नेव पत्ता गुरूण तो समरिअं वयणं ॥४॥ तत्थ य दुल्लहराओ राया रायव्व सव्वकलकलिओ । तत्थ (स्स) पुरोहिअसारो सोमेसरनामओ आसी ॥ ५ ॥ तस्स घरे संपन्ना (ते पत्ता) सोऽविहु तणयाण वेअअज्झयणं । कारेमाणो दिट्ठो सिट्ठो सूरिप्पहाणेहिं ॥ ६॥ सुणु वक्रवाणं वेअस्स एरिसं सारणीइ परिसुद्धं । सोऽवि सुणंतो उप्फुल्ललोअण्णो विम्हिओ जाओ ॥ ७ ॥ किं बम्हा रूवजुयं काऊणं अत्तणा इहं उइण्णो । इअ चिंतंतो विप्पो पयपउमं वंदई तेसिं ॥ ८ ॥ सिवसासणस्स जिणसासणस्स सारक्खरे गहेऊणं । इअ आसीसा दिन्ना सूरीहिं सकज्जसिद्धिकए ॥ ९ ॥ “अपाणि पादो ह्यमनो ग्रहीता, पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णाः । स वेत्ति विश्वं नहि तस्य वेत्ता, शिवो ह्यरुपी स जिनोऽवताद्वः ॥ १० ॥ तो विप्पो ते जंपइ चिट्ठह गुठ्ठी तुमेहिं सह होइ ।। तुम्ह पसाया वेअत्थपारगा हुंति मे अ सुआ ॥ ११ ॥ ठाणाभावा अम्हे चिट्ठामो कत्थ इत्थ तुह नयरे ? । चेइअवासिअमुणिणो न दिति सुविहिअजणे वसिउ ॥१२॥ तेणवि सचंदसाला उवरिं ठावित्तु सुद्ध असणेणं ।
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy