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________________ २४ ये आचार्य किस गच्छ एवं किस शाखा के थे ? शिलालेख में कुछ भी नहीं लिखा है । “संवत् १२८१ वैशाख सुदि ३ शनौ पितामह . साम्ब पितृ . जसवीर मातृ लाष एतेषां श्रेयोऽर्थं सुत गांधी गोसलेन बिंबं कारितं प्रतिष्ठितञ्च श्रीचन्द्रसूरिशिष्यः श्रीजिनेश्वरसूरिभिः ॥" आ. बु. धातु ले. सं., लेखांक ६२७ ये आचार्य शायद जिनपतिसूरि के पट्टधर हो, इनके समय तक भी खरतर शब्द का प्रयोग अपमान बोधक होने से नहीं हुआ था । “सं. १३५१ माघ वदि १ श्रीप्रल्हादनपुरे श्रीयुगादिदेवविधिचैत्य श्रीजिनप्रबोधसूरिशिष्य श्रीजिनचंद्रसूरिभिः श्रीजिनप्रबोधसूरिमूर्तिप्रतिष्ठा कारिता रामसिंहसुताभ्यां सा. नोहा कर्मण श्रावकाभ्यां स्वामातृ राई मई श्रेयोऽर्थं ॥" आ. बु. धा. ले. सं., लेखांक ७३४ ये आचार्य जिनदत्तसूरि के पांचवे पट्टधर थे । इनके समय तक भी खरतर शब्द को गच्छ का स्थान नहीं मिला था । “ॐ संवत् १३७९ मार्ग. वदि ५ प्रभु जिनचंद्रसूरिशिष्यैः श्री कुशलसूरिभि श्री शान्तिनाथबिंबं प्रतिष्ठितं कारितञ्च सा. सहजपालपुत्रैः सा. धाधल गयधर थिरचंद्र सुश्रावकैः स्वपितृ पुण्यार्थं ॥" बाबू पूर्ण., खंड तीसरा, लेखांक २३८९ ॐ सं. १३८१ वैशाख वदि ५ श्री पत्तने श्री शांतिनाथविधिचैत्ये श्री जिनचंद्रसूरिशिष्यैः श्रीजिनकुशलसूरिभिः श्रीजिनप्रबोधसूरिमूर्तिप्रतिष्ठा कारिता च सा. कुमारपाल रतनैः सा. महणसिंह सा. देवाल सा. जगसिंह सा. मेहा सुश्रावकैः सपरिवारैः स्वश्रेयोऽर्थम् ॥ बाबू पूर्ण., खण्ड दूसरा, लेखांक १९८८ “संवत् १३९१ मा. श्री. १५ खरतरगच्छीय श्री जिनकुशलसूरि शिष्यैः जिनपद्मसूरिभि: श्री पार्श्वनाथप्रतिमा प्रतिष्ठिता कारिता च भव. बाहिसुतेन रत्नसिंहेन पुत्र आल्हानादि परिवृतेन स्वपितृ सर्व पितृव्य पुण्यार्थं ॥" बाबू पूर्ण., खं. दूसरा, लेखांक १९२६ "सं. १३९९ भ. श्रीजिनचन्द्रसूरिशिष्यैः श्रीजिनकुशलसूरिभिः श्रीपार्श्वनाथबिंबं प्रतिष्ठितं कारितं च सा. केशवपुत्र रत्न सा. जेहदु सु श्रावकेन पुण्यार्थं ।" बाबू पूर्ण., खं. दूसरा, लेखांक १५४५
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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