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________________ १९० hamaramanian.comwww जिनचन्द्र चातुर्मास एवं बरसात के दिनों में विहार कर आगरे आ रहा है। वहां के लोगों ने सोचा कि यदि जिनचन्द्र चातुर्मास में आगरे आ गया तो आचार्य विजयहीरसूरि ने जो बादशाह पर जैन धर्म का प्रभाव डाला है वह मटियामेट कर डालेगा। समय पाकर किसीने बादशाह अकबर को अर्ज की कि हमारे जैन साधु चातुर्मास में विहार नहीं करते हैं क्योंकि बरसात के कारण जीवों की उत्पत्ति बहुत हो जाती है। अतः जैन धर्म के उसूल पर पाबन्द रहने वाले जैन साधु चातुर्मास में विहार नहीं करते हैं। सुना गया है कि आपके फरमान से जिनचन्द्रसूरि चातुर्मास में विहार कर आ रहे हैं और वह गुजरात से जावलीपुर तक आ भी गये हैं इत्यादि । बादशाह ने सोचा कि जब जिनचन्द्रसूरि अपने धर्म के उसूलों को भी पालन नहीं करता है तो यहां आकर वह क्या करने वाला है ? अतः बादशाह ने फौरन एक फरमान' जिनचन्द्रसूरि के नाम लिख कर जावलीपुर भेज दिया, जिसका आशय यह था कि आप चातुर्मास में यहां न पधारें। यदि आपको आना है तो चातुर्मास के बाद पधारना इत्यादि। बादशाह का यह फरमान जावलीपुर जिनचन्द्रसूरि के पास पहुंचा। जिनचन्द्रसूरि ने किसी से पढ़ाकर उसको सुना तो एक दीर्घ निश्वास डाल कर पश्चाताप करने लगा कि हाय रे हाय ! जिस बादशाह अकबर से मिलने के लिये मैंने तीर्थंकरों की आज्ञा का अनादर किया, शास्त्र मर्यादा और परम्परा का भंग किया, ग्राम ग्राम के श्रीसंघ की आज्ञा का उल्लंघन किया, त्रस स्थावर जीवों की विराधना की और जैन धर्म की निन्दा करवाई, फिर भी इन सब का नतीजा यह हुआ कि बादशाह की मनाई के हकम का फरमान आ गया। शायद उस दिन जिनचन्द्र ने आहार पानी भी नहीं किया होगा। इतना ही क्यों पर जिनचन्द्रसूरि के कई साधु शुरु से इस प्रकार चातुर्मास में विहार करने के विरुद्ध थे, वे भी बोल उठे कि सूरिजी! हम लोगों ने आपसे अर्ज की थी कि बादशाह अकबर कहीं भाग जाने वाला नहीं है। आप चातुर्मास के बाद विहार कर आगरे पधारना पर आपने किसी की भी नहीं सुनी। खैर, लो अब पधारो आगरे और दो बादशाह अकबर को उपदेश ! इसपर जिनचन्द्र ने कहा साधुओं ! आज तुम हमारे दुश्मन बन कर ‘दादा पर खार १. उस समय लाहौर से सम्राट ने दो व्यक्तियों के साथ फरमान पत्र सूरिजी को भेजा। जिसमें लिखा था कि चातुर्मास में आपको आने का कष्ट होता होगा, अतएव चातुर्मास पूरा करके पधारना। यु. प्र. जि., पृष्ठ ३९
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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