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________________ १७० woman.anaman. को युगप्रधान क्यों करार देते हैं ? जैनधर्म में युगप्रधान दो प्रकार के माने गये हैं। १. नाम युगप्रधान २. गुण युगप्रधान । यदि जिनदत्तसूरि नाम युगप्रधान ही है तो कुछ कहने लिखने को रहता ही नहीं है और इस युगप्रधान की कीमत हाल में कृपाचन्द्रसूरि, जिनचन्द्रसूरि एवं चरित्रसूरि से अधिक हो भी नहीं सकती है। यदि कोई जिनदत्त को गुण युगप्रधान मानते हों तो उनकी बड़ी भारी भूल है क्योंकि भाव युगप्रधान का एक भी गुण जिनदत्तसूरि में नहीं था। (१) युगप्रधान उत्सूत्र की प्ररुपणा नहीं करते हैं किन्तु जिनदत्तसूरि ने पाटण नगर में यह प्ररुपणा की थी कि स्त्री जिनपूजा नहीं कर सके। इससे तो जिनदत्तसूरि को अर्द्ध ढूंढिया कहा जा सकता है, क्योंकि ढूंढियों ने पुरुष और स्त्रिये दोनों को जिनपूजा का निषेध किया हैं और जिनदत्तसूरि ने एक स्त्रियों को ही प्रभुपूजा का निषेध किया। किन्तु शास्त्रों में विधान है कि द्रौपदी, मृगावती, जयन्ति, प्रभावती, चेलना आदि स्त्रियों ने प्रभुपूजा की हैं और इस शास्त्राज्ञा को जिनदत्तसूरि के गुरु तक भी मानते आए थे। केवल जिनदत्तसूरिने ही "स्त्री जिनपूजा न करे" ऐसा कह कर जिनाज्ञा का भंग किया। अर्थात् उत्सूत्र की प्ररुपणा की। क्या ऐसे जिनाज्ञाभंजक को ही युगप्रधान कहते हैं ? (२) युगप्रधान उत्सूत्र प्ररुपको का पक्ष नहीं करते हैं तब जिनदत्तसूरि ने छ कल्याणक प्ररुपक जिनवल्लभसूरि का पक्ष कर खुदने भी भगवान् महावीर के छ: कल्याणक की प्ररुपणा कर कई भद्रिक जैन लोगों को सन्मार्ग से पतित बनाया। क्या ऐसे उत्सूत्र प्ररुपक भी युगप्रधान हो सकते हैं ? (३) युगप्रधान किसी को श्राप नहीं देते हैं तब जिनदत्तसूरिने पाटण के अंबड श्रावक को श्राप दिया कि जा ! तूं निर्धन एवं दुःखी होगा (देखो दादा की पूजा में) (४) युगप्रधान की आज्ञा सकल संघ शिरोधार्य करते हैं तब चन्द व्यक्तियों के सिवाय जैन संघ जिनदत्तसूरि को उत्सूत्र प्ररुपक मानते थे। (५) युगप्रधान आचार्यपद के लिए झगड़ा नहीं करते है किन्तु जिनवल्लभसूरि के देहान्त के बाद जिनदत्तसूरि और जिनशेखरसूरि ने आचार्य पदवी के लिए झगड़ा किया, जिनदत्तसूरि कहते थे कि मैं आचार्य होऊंगा और जिनशेखरसूरि कहते थे कि मैं आचार्य बनूंगा। आखिर दोनों आचार्य बन गए। क्या युगप्रधान ऐसे ही होते हैं ? सकल संघ तो दूर रहा पर एक गुरु की संतान में भी इतना झगड़ा होवे और ऐसे झगड़ालुओं को युगप्रधान कहना क्या हमारे खरतरों का अन्तरात्मा स्वीकार कर लेगा?
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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