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________________ १२८ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ "देव सूरि पह नेमि वह, वह गुणिहि पसिद्धउ । उज्जोयणु तह वद्धमाणु, खरतरवरलद्धउ॥" इस लेख से स्पष्ट सिद्ध है कि 'खरतर बिरुद' प्राप्त करने वाले जिनेश्वरसूरि नहीं किन्तु उद्योतनसरि और वर्धमानसूरि हैं। जिन लोगों का कहना था कि जिनेश्वरसूरि को शास्त्रार्थ की विजय में दुर्लभराज ने खरतर बिरुद इनायत किया यह तो बिलकुल मिथ्या ठहरता है। क्योंकि जिनेश्वरसूरि के गुरु वर्धमानसूरि और वर्धमानसूरि के गुरु उद्योतनसूरि थे। यदि उद्योतनसूरि को ही "खरतरबिरुद" मिल गया था तो फिर जिनेश्वरसूरि के लिए शास्त्रार्थ की विजय में खरतरबिरुद मिला कहना तो स्वयं असत्य साबित होता है। पर यह विषय भी विचारणीय हैं क्योंकि पल्ह कवि कृत खरतरपट्टावली और उनका खुद का समय भी विक्रम की बारहवीं शताब्दी में जिनदत्तसूरि के समकालीन है और यह कविता भी जिनदत्तसूरि को ही लक्ष्य में रख कर बनाई गई है। फिर भी कवि का हृदय ही संकीर्ण था क्योंकि उसने खरतर की महत्ता बताने को खरतरबिरुद का संयोग श्रीउद्योतनसूरि से ही किया। अच्छा तो यह होता कि कवि श्रीमहावीर प्रभु के पट्टधर सौधर्माचार्य को ही खरतर बिरुद से विभूषित कर देता। उसके ऐसा करने से सारा झगड़ा बखेड़ा स्वयं मिट जाता और जैनसमाज खरतरगच्छ का ही उपासक बन जाता। वास्तव में तो कविता का आशय जिनदत्तसूरि को ही खरतर कहने का था। यदि ऐसा न होता तो उद्योतनसूरि, वर्धमानसूरि, जिनेश्वरसूरि, बुद्धिसागरसूरि, जिनचन्द्रसूरि, अभयदेवसूरि, जिनवल्लभसूरि, जिनदत्तसूरि, जिनचन्द्रसूरि और जिनपतिसूरि तक के सैकड़ों ग्रन्थ और शिलालेख मिलते हैं, जिनमें कतिपय का उल्लेख तो हम उपर कर आये हैं कि तीन सौ वर्षों में किसीने ही खरतर शब्द का उल्लेख तक भी नहीं किया है और एक अप्रसिद्ध अपभ्रंश भाषा के पल्ह नामक कवि ने उद्योतनसूरि को खरतर बिरुदधारक लिख दिया और खरतरों का उस पर यकायक बिना सोचे समझे विश्वास कर लेना सभ्य समाज को सन्तोषप्रद नहीं हो सकता। कई अज्ञ लोगों का यह भी कथन है कि पाटण के राजा दुर्लभ की राजसभा में आचार्य जिनेश्वरसूरि और चैत्यवासियों के बीच शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें 'खरा' रहने वालों को 'खरतर' और हार जाने वालों को 'कँवला' कहा। और वह खरतर तथा कँवला शब्द आज भी मौजूद हैं। पूर्वोक्त बात कहने वालों का अभिगम शायद यह हो कि यह शास्त्रार्थ केवल उपकेशगच्छ वालों के साथ ही हुआ, कारण कँवला आजकल उपकेशगच्छवालों को ही कहते हैं। इस शास्त्रार्थ के समय पाटण में अनेकाचार्यों के उपाश्रय और
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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