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________________ १२७ छपा दिया है। नहीं तो यदि बाबूजी आज भी उस मूर्ति का दर्शन करवा दें तो इतिहास पर अच्छा प्रकाश पड़ सकता है एवं साथ ही खरतरों का प्राचीनत्व भी पुष्ट प्रमाणों से आम जनता में जाहिर हो सकता है। भला ! यह समझ में नहीं पड़ता कि खरतर लोग खरतर शब्द को प्राचीन मानने में इतना आकाश पाताल एक न कर यदि अर्वाचीन ही मान लें तो क्या सकता है। हर्ज है? जिनदत्तसूरि के पहले खरतर शब्द इनके किन्हीं आचार्यों ने नहीं माना था। विक्रम की सोलहवीं शताब्दी का शिलालेख हम पूर्व लिख ही आये हैं। वहाँ तक तो खरतरगच्छ मंडन जिनदत्तसूरि को ही लिखा मिलता है। पर तपागच्छ और खरतरों के आपस में वाद-विवाद होने से, इधर खरतरों ने देखा कि जिनेश्वरसूरि के और चैत्यवासियों के आपस में शास्त्रार्थ तो हुआ ही था, यदि उनकी विजय में 'खरतर बिरुद' मान लिया जाय तो क्या हानि है, क्योंकि यह बात प्रसङ्गवशात् मिलती जान पड़ सकती है और प्राचीन भी है। और भविष्य में कोई आशा नहीं कि इसका निर्णय भी होगा तथा नौ अङ्ग वृत्तिकार अभयदेवसूरि भी खरतर गच्छ में माने जायेंगे और इनकी बनाई नौ अंग की टीका सर्वमान्य है। अतः सर्व गच्छ हमारे आधीन रहेंगे। बस इसी हेतु से इन लोगों ने कल्पित ढाँचा खड़ा कर दिया। पर अन्त में वह कहाँ तक सच्चा रह सकता है ? जब सत्य की शोध की जाती है तो सबकी कलई खुल जाती है। खरतर गच्छ को प्राचीन प्रमाणित करनेवाला एक लेख खरतरों को फिर अनायास मिल गया है और वह पल्ह कवि कृत खरतर पट्टावली में है। जो यहाँ लिखते हैं १. श्रीमान् अगरचन्दजी नाहटा बीकानेर वालों द्वारा मालूम हुआ कि वि. सं. ११४७ वाली मूर्ति पर का लेख दब गया है। आठ सौ वर्षों का लेख लेते समय तक तो स्पष्ट बचता था केवल ३-४ वर्षों में ही दब गया, यह आश्चर्य की बात है। भीनासर में भी वि. सं. ११८१ की मूति पर शिलालेख में 'खरतर गच्छ' का नाम बतलाया जाता है। इसकी शोध के लिये एक आदमी भेजा गया, पर वह लेख स्पष्ट नहीं बचता है, केवल अनुमान से ही ११८१ मान लिया है। खैर इसी प्रकार बारहवीं शताब्दी का यह हाल है तब हम चाहते हैं जिनेश्वरसूरि, बुद्धिसागर और अभयदेवसूरि के समय के प्रमाण । यदि जिनवल्लभसरि के समय, सोमचन्द्र मनि (होने वाले जिनदत्तसरि)की प्रकति के कारण खरतर कहलाये हों और किसीने खरतर लिख भी दिया हो तो इससे जिनेश्वरसूरि को खरतर बिरुद मिलना साबित नहीं हो सकता है। खरतर गच्छ वालों को चाहिये कि वे जिनेश्वरसूरि के समय के प्रमाणों की खोज कर जनता के सामने रखें।
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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