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________________ ११७ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ तयोरेव विनेयानां, तत्पदञ्चाऽनुकुर्वताम् । श्रीमतां जिनचंद्राख्य, सत्प्रभूणां नियोगतः ॥ ६ ॥ श्रीमज्जिनेश्वराचार्य-शिष्याणां गुणशालिनाम् ।। जिनभद्रमुनीन्द्राणामस्माकं चांघ्रिहिसेविनः ॥ ७ ॥ यशश्चन्द्रगणेढ़साहाय्यात् सिद्धिमागता । परित्यक्ताऽन्यकृत्यस्य, युक्तायुक्तविवेकिनः॥ ८ ॥ शास्त्रार्थनिर्णयसुसौरभलम्पटस्य, विद्वन्मधुव्रतगणस्य सदैव सेव्यः । श्रीनिर्वृताख्यकुलसन्नदपद्मकल्पः, श्रीद्रोणसूरिरनवद्ययशःपरागः ॥ ९ ॥ शोधितवान् वृत्तिमिमां, युक्तो विदुषां महासमूहेन । शास्त्रार्थ-निष्कनिकषण, कषपट्टककल्पबुद्धिनाम् ॥ १० ॥ इस टीका में अभयदेवसूरि अपने को चन्द्रकुल के बताते हैं और अपनी रची हुई टीका निर्वृत्तिकुल के द्रोणाचार्य (चैत्यवासी) से संशोधित कराई ऐसा लिखते हैं। जिसके प्रत्युपकार में जिनवल्लभसूरि ने 'संघपट्टक' ग्रंथ में उनको खूब फटकारा है। यहां तक कि उनकी मानी हुई जिनप्रतिमा को मांस की बोटी की उपमा दी है और स्वयं आपने साधारण श्रावक से नया मन्दिर बनवाके उसके द्वार पर पत्थर में संघपट्टक के ४० श्लोक खुदवाये थे, क्या यह सावध कार्य नहीं था? अब आगे चल कर ज्ञाताधर्मकथांग सूत्र की टीका देखिये :तस्याचार्यजिनेश्वरस्य मदवद्वादिप्रतिस्पर्धिनः । तद्वन्धोरपि "बुद्धिसागर" इति ख्यातस्य सूरे वि ॥ छन्दोबन्धनिबन्धबन्धुरवचः शब्दादिसल्लक्ष्मणः । श्रीसंविग्नविहारिणः श्रुतनिधेश्चारित्रचूड़ामणेः ॥ ८ ॥ शिष्येणाऽभयदेवाख्यसूरिणा विवृतिः कृता । ज्ञाताधर्मकथाङ्गस्य, श्रुतभक्त्या समासतः ॥ ९ ॥ आगे फिर श्रीऔपपातिक वृत्ति का विलोकन करें । चन्द्रकुलविपुलभूतल-युगप्रवरवर्धमानकल्पतरोः । कुसुमोपमस्य सूरेर्गुणसौरभभरितभवनस्य ॥ १ ॥ निस्सम्बन्धविहारस्य, सर्वदा श्रीजिनेश्वराह्वस्य । शिष्येणाऽभयदेवाख्यसूरिणेयं कृता वृत्तिः ॥ २ ॥
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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