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________________ १०३ ~ ~ ~ ~ ~ अष्टमी की वृद्धि होने से पहली अष्टमी को पर्व मानते हैं फिर भी विशेषता यह है कि चौदस का क्षय होने पर पाक्षीक प्रतिक्रमण पूर्णिमा को करते हैं जो खास तौर अपनी मान्यता से भी खिलाफ है। १०. पर्व १. अधिक मास को शास्त्रकारों ने कालचूला एवं लुनमास माना है। यदि श्रावण मास दो हों तो प्रथम श्रावण को लुनमास समझ कर सांवत्सरिक प्रतिक्रमण भाद्रपद में ही किया जाता है तथा भाद्रपद दो हों तो प्रथम भाद्रपद को लुनमास समझ कर दूसरे भाद्रपद में ही सांवत्सरिक प्रतिक्रमण करना चाहिये पर खरतरे कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ मास दो हों तो चतुर्मासिक प्रतिक्रमण दूसरे कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ में करते हैं तथा आश्विन एवं चैत्र मास दो हों तो आंबिल की ओलियां दूसरे आसोज एवं दूसरे चैत्र मास में करते हैं। पर श्रावण भाद्रपद मास दो हों तो दूसरा श्रावण या पहले भाद्रपद में सांवत्सरिक प्रतिक्रमण करते हैं। यह एक शास्त्रों की अनभिज्ञता या मिथ्या हठ ही कहा जा सकता है। यदि खरतर भाई कहते हैं कि आषाढ़ चातुर्मासी से ५० वे दिन सांवत्सरिक प्रतिक्रमण करना चाहिये। जब श्रावण दो हों तो दूसरे श्रावण और भाद्रपद दो हों तो पहले भाद्रपद में सांवत्सरिक प्रतिक्रमण करने से ही ५० दिन माने कहा जा सकता है पर वे भाई समवायांगजी सूत्र के पाठ को नहीं देखते हैं कि आषाढ़ चातुर्मासिक से ५० दिन तथा कार्तिक चातुर्मास के ७० दिन पूर्व सांवत्सरिक प्रतिक्रमण करना चाहिये। जब दूसरे श्रावण तथा पहले भाद्रपद में सांवत्सरिक प्रतिक्रमण किया जाय तो पिछले ७० दिनों के बजाय १०० रह जायेगा अतः एक तरफ आज्ञापालन करने को जाते हैं तो दूसरी तरफ जिनाज्ञा भंग की गठरी सिर पर उठानी पड़ती है। इसमें भी विशेषता यह है कि पूर्व के ५० दिन अध्रुव हैं और पिछले ७० दिन ध्रुव हैं। अतः अब किसकी रक्षा करना जरुरी है? अगर हमारे खरतर भाई कार्तिक, फाल्गुन, आषाढ़, आश्विन और चैत्र मास दो होने पर पहले मास को लुनमास मानकर सब धर्मकृत्य दूसरे मास में करते हैं तो इसी मुताबिक दो श्रावण भाद्रपद होने पर पहले को लुनमास एवं कालचूला मान लें तो पहले के ५० दिन भी रह सकते हैं और पिछले ७० दिन भी रह सकते हैं। __ जैसे सोलह दिनों का पक्ष होने पर भी चौदस को पक्षी प्रतिक्रमण कर उसको पक्ष ही कहते हैं। ११८ एवं १२२ दिन का चौमासी प्रतिक्रमण कर उसे चौमासी
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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