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________________ आगम सूत्र ४३, मूलसूत्र-४, ‘उत्तराध्ययन' अध्ययन/सूत्रांक सूत्र - ४३७-४३९ _ ''राजन् ! समय व्यतीत हो रहा है, रातें दौड़ती जा रही हैं । मनुष्य के भोग नित्य नहीं हैं । काम-भोग क्षीण पुण्यवाले व्यक्ति को वैसे ही छोड़ देते हैं, जैसे कि क्षीण फलवाले वृक्ष को पक्षी। यदि तू काम-भोगों को छोड़ने में असमर्थ है, तो आर्य कर्म ही कर । धर्म में स्थित होकर सब जीवों के प्रति दया करनेवाला बन, जिससे कि तू भविष्य में वैक्रियशरीरधारी देव हो सके। भोगों को छोड़ने की तेरी बुद्धि नहीं है । तू आरम्भ और परिग्रह में आसक्त है । मैंने व्यर्थ ही तुझ से इतनी बातें की, तुझे सम्बोधित किया । राजन्, मैं जा रहा हूँ।'' सूत्र -४४० पांचाल देश का राजा ब्रह्मदत्त मुनि के वचनों का पालन न कर सका, अतः अनुत्तर भोगों को भोगकर अनुत्तर नरक में गया। सूत्र-४४१ कामभोगों से निवृत्त, उग्र चारित्री एवं तपस्वी महर्षि चित्र अनुत्तर संयम का पालन करके अनुत्तर सिद्धिगति को प्राप्त हुए।-ऐसा मैं कहता हूँ। अध्ययन-१३ का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण मुनि दीपरत्नसागर कृत् “(उत्तराध्ययन) आगमसूत्र-हिन्दी अनुवाद" Page 40
SR No.034712
Book TitleAgam 43 Uttaradhyayan Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages129
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 43, & agam_uttaradhyayan
File Size2 MB
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