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आगम सूत्र ४३, मूलसूत्र-४, 'उत्तराध्ययन'
अध्ययन/सूत्रांक सूत्र - १०८
___ कर्मों के हेतुओं को दूर करके और क्षमा से यश-का संयम करके वह साधक पार्थिव शरीर को छोड़कर ऊर्ध्व दिशा की ओर जाता है। सूत्र - १०९
अनेक प्रकार के शील का पालन करने से देव होते हैं । उत्तरोत्तर समृद्धि के द्वारा महाशुक्ल की भाँति दीप्तिमान होते हैं। और तब वे 'स्वर्ग से च्यवन नहीं होता है। ऐसा मानने लगते हैं। सूत्र-११०
एक प्रकार से दिव्य भोगों के लिए अपने को अर्पित किए हुए वे देव इच्छानुसार रूप बनाने में समर्थ होते हैं । तथा ऊर्ध्व कल्पों में पूर्व वर्ष शत तक रहते हैं । सूत्र - १११
वहां देवलोक में यथास्थान अपनी काल-मर्यादा तक ठहरकर, आयु क्षय होने पर वे देव वहाँ से लौटते हैं, और मनुष्य योनि को प्राप्त होते हैं । वे वहाँ दशांग से युक्त होते हैं । सूत्र - ११२
क्षेत्रभूमि, वास्तु, स्वर्ण, पशु और दास ये चार काम-स्कन्ध जहां होते हैं, वहाँ वे उत्पन्न होते हैं। सूत्र-११३
वे सन्मित्रों से युक्त, ज्ञातिमान्, उच्च गोत्रवाले, सुन्दर वर्णवाले, नीरोग, महाप्राज्ञ, अभिजात, यशस्वी और बलवान होते हैं। सूत्र - ११४
जीवपर्यन्त अनुपम मानवीय भोगों को भोगकर भी पूर्व काल में विशुद्ध सद्धर्म के आराधक होने के कारण निर्मल बोधि का अनुभव करते हैं। सूत्र-११५
पूर्वोक्त चार अंगो को दुर्लभ जानकर साधक संयम धर्म को स्वीकार करते हैं । अनन्तर तपश्चर्या से समग्र कर्मों को दूर कर शाश्वत सिद्ध होते हैं। -ऐसा मैं कहता हूँ।
अध्ययन-३ का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण
मुनि दीपरत्नसागर कृत् “(उत्तराध्ययन) आगमसूत्र-हिन्दी अनुवाद"
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