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________________ आगम सूत्र ३९, छेदसूत्र-५, 'महानिशीथ' अध्ययन/उद्देश/सूत्रांक गोलिकाएं बुनती हैं । उसके बाद वो बाँधी हुई गोलिकाओं को दोनों कान के साथ बाँधकर अनमोल उत्तम जातिवंत रत्न ग्रहण करने की इच्छावाले समुद्र के भीतर प्रवेश करते हैं । समुद्र में रहे जल, हाथी, भेंस, गोधा, मगरमच्छ, बड़े मत्स्य, तंतु सुसुमार आदि दुष्ट श्वापद उसे कोई उपद्रव नहीं करते । उस गोलिका के प्रभाव से भयभीत हुए बिना सर्व समुद्रजल में भ्रमण करके इच्छा के अनुसार उत्तम तरह के जातिवंत रत्न का संग्रह करके अखंड़ शरीरवाला बाहर नीकल आता है । उन्हें जो अंतरंग गोलिका होती है उनके सम्बन्ध से वो बेचारे हे गौतम ! अनुपम अति घोर भयानक दुःख पूर्वभव में उपार्जित अति रौद्र कर्म के आधीन बने वो अहेसास करते हैं। हे भगवंत ! किस कारण से ? हे गौतम ! वो जिन्दा हो तब तक उनकी गोलिका ग्रहण करने के लिए कौन समर्थ हो सके ? जब उनके देह में से गोलिका ग्रहण करते हैं तब कईं तरह के बड़े साहस करके नियंत्रणा करनी पड़ती है । बख्तर पहन के, तलवार, भाला, चक्र, हथियार सजाए ऐसे कईं शूरवीर पुरुष बुद्धि के प्रयोग से उनको जिन्दा ही पकडते हैं । जब उन्हें पकडते हैं तब जिस तरह के शारीरिक-मानसिक दुःख होते हैं वो सब नारक के दुःख के साथ तुलना की जाती है। हे भगवंत ! वो अंतरंग गोलिका कौन ग्रहण करते हैं ? हे गौतम ! उस लवण समुद्र में रत्नद्वीप नाम का अंतर्दीप है, प्रतिसंतापदायक स्थल से वो द्वीप ३१०० योजन दूर है वो रत्नद्वीप मानव उसे ग्रहण करते हैं । हे भगवंत ! किस प्रयोग से ग्रहण करते हैं ? क्षेत्र के स्वभाव से सिद्ध होनेवाले पूर्व पुरुषों की परम्परा अनुसार प्राप्त किए विधान से उन्हें पकड़ते हैं । हे भगवंत ! उनका पूर्व पुरुष ने सिद्ध किया हुवा विधि किस तरह का होता है ? हे गौतम ! उस रत्नद्वीप में २०, १९, १८, १०,८,७धनुष्य प्रमाणवाले चक्की के आकार के श्रेष्ठ वज्रशिला के संपुट होते हैं । उसे अलग करके वो रत्नद्वीपवासी मानव पूर्व के पुरुष से सिद्ध क्षेत्र-स्वभाव से सिद्ध-तैयार किए गए योग से कईं मत्स्य-मधु इकट्ठे करके अति रसवाले करके उसके बाद उसमें पकाए हुए माँस के टुकड़े और उत्तम मद्य, मदीरा आदि चीजें डालते हैं। ऐसे उनके खाने के लायक उचित मिश्रण तैयार करके विशाल लम्बे बड़े पेड के काष्ट से बनाए यान में बैठकर स्वादिष्ट पुराने मदीरा, माँस, मत्स्य, मध आदि से परिपूर्ण कईं तंबडा ग्रहण करके प्रति संतापदायक नाम की जगह के पास आते हैं । जब गुफावासी अंडगोलिक मानव को एक तुंबड़ा देकर और अभ्यर्थना-बिनती का प्रयोग करके लायक उस काष्ठयान को अति वेगवान् चलाकर रत्नद्वीप की और दौड़ जाते हैं। अंडगोलिक मानव उस तुंब में से मध, माँस आदि मिश्रण-भक्षण करते हैं और अति-स्वादिष्ट लगने से फिर पाने के लिए उनके पीछे अलग-अलग होकर दौड़ते हैं। तब गौतम ! जितने में अभी काफी नजदीक न आए उतने में सुन्दर स्वादवाले मधु और खुशबूवाले द्रव्य से संस्कारित पुराणा मदिरा का एक तुंब रास्ते में रखकर फिर से भी अति त्वरित गति से रत्नद्वीप की और चले जाते हैं । और फिर अंडगोलिक मानव वो अति स्वादिष्ट, मधु और खुशबूवाले द्रव्य से संस्कारित तैयार किए पुराने मदिरा माँस आदि पाने के लिए अतिदक्षता से उसकी पीठ पीछे दौड़ते हैं । उन्हें देने के लिए मधु से भरे एक तुंब को रखते हैं । उस प्रकार हे गौतम ! मद्य, मदिरा के लोलुपी बने उनको तुंब के मद्य, मदिरा आदि से फाँसते तब तक ले जात हैं कि जहाँ पहले बताए चक्की आकार के वज्र की शीला के संपुट हैं । जितने में खाद्य की लालच से वो जितनी भूमि तक आते हैं उतने में ही जो पास के वज्रशीला के संपुट का अग्र हिस्सा जो बगासा खाते पुरुष के आकार समान छूटा पहले से ही रखा होता है । वहीं मद्य, मदिरा से भरे बाकी रहे कईं तुंब उनकी आँख के सामने हो वहाँ रखकर अपनी-अपनी जगह में चले जाते हैं । वो मद्यमदिरा खाने के लोलुपी जितने में चक्की के पास पहुँचे और उस पर प्रवेश करे उस समय हे गौतम ! जो पहले पकाए हुए माँस के टुकड़े वहाँ रखे हों और जो मद्य-मदिरा से भरे भोजन वहाँ रखे हो और फिर मध से लीपित शीला के पड़ हो उसे देखकर उन्हें काफी संतोष, आनन्द, बड़ी तुष्टि, महाप्रमोद होता है। इस प्रकार मद्य-मदिरा पकाए हुए माँस खाते-खाते साँत-आँठ, पंद्रह दिन जितने में पसार होते हैं, उतने में रत्नद्वीप निवासी लोग इकट्ठे होकर कुछ लोगों ने बख्तर, कुछ लोगों ने आयुध धारण किए हों, वो उस वज्रशीला को चीपककर साँत-आँठ पंक्ति में घेर लेते हैं । और फिर रत्नद्वीपवासी दूसरे कुछ मनुष्य उस शिला पड़ को घंटाल मुनि दीपरत्नसागर कृत् (महानिशीथ) आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद Page 65
SR No.034707
Book TitleAgam 39 Mahanishith Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 39, & agam_mahanishith
File Size3 MB
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