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________________ आगम सूत्र ३९, छेदसूत्र-५, 'महानिशीथ' अध्ययन/उद्देश/सूत्रांक जिससे बार-बार घोर भव-परम्परा में हमारा भ्रमण हो । तब सुमति ने कहा कि वो कुशील हो या सुशील हो तो भी मैं तो उनके पास ही प्रव्रज्या अपनाऊंगा और फिर तुम कहते हो वही धर्म है लेकिन उसे करने के लिए आज कौन समर्थ है ? इसलिए मेरा हाथ छोड़ दो, मुजे उनके साथ जाना है वो दूर चले जाएंगे तो फिर मिलन होना मुश्किल है । तब नागिल ने कहा कि-हे भद्रमुख ! उनके साथ जाने में तुम्हारा कल्याण नहीं, मैं तुम्हें हित का वचन देता हूँ। यह हालात होने से ज्यादा गुणकारक हो उसका ही सेवन कर । मैं कहीं तुम्हें बलात्कार से नहीं पकड़ रहा। अब बहोत समय कईं उपाय करके निवारण करने के बावजूद भी न रूका और मंद भाग्यशाली उस सुमति ने हे गौतम ! प्रव्रज्या अंगीकार करके उस के बाद समय आने पर विहार करते करते पाँच महिने के बाद महा भयानक बारह साल का अकाल पड़ा, तब वो साधु उस काल के दोष से, दोष की आलोचना प्रतिक्रमण किए बिना मौत पाकर भूत, यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि व्यंतर देव के वाहनरूप से पेदा हुए । बाद में म्लेच्छ जाति में माँसाहार करनेवाले क्रूर आचरण करनेवाले हुए । क्रूर परीणामवाले होने से साँतवी नारकी में पैदा हुए वहाँ से नीकलकर तीसरी चौबीसी में सम्यक्त्व पाएंगे । उसके बाद सम्यक्त्व प्राप्त हुए भव से तीसरे भव में चार लोग सिद्धि पाएंगे, लेकिन जो सर्वथा बड़े पाँचवे थे वो एक सिद्धि नहीं पाएंगे । क्योंकि वो एकान्त मिथ्यादृष्टि और अभव्य हैं । हे भगवंत ! जो सुमति है वो भव्य या अभव्य ? हे गौतम, वो भव्य हैं । हे भगवंत ! वो भव्य हैं तो मरके कहाँ उत्पन्न होंगे ? हे गौतम ! परमधार्मिक असुरों में उत्पन्न होगा। सूत्र-६७८ हे भगवन् ! भव्य जीव परमाधार्मिक असुर में पैदा होते हैं क्या ? हे गौतम ! जो किसी सज्जड़ राग, द्वेष, मोह और मिथ्यात्व के उदय से अच्छी तरह से कहने के बावजूद भी उत्तम हितोपदेश की अवगणना करते हैं । बारह तरह के अंग और श्रुतज्ञान को अप्रमाण करते हैं और शास्त्र के सद्भाव और भेद को नहीं जानते, अनाचार की प्रशंसा करते हैं, उसकी प्रभावना करते हैं, जिस प्रकार सुमति ने उन साधुओं की प्रशंसा और प्रभावना की-वो कुशील साधु नहीं है, यदि यह साधु भी कुशील है तो इस जगत में कोई सुशील साधु नहीं । उन साधुओं के साथ जाकर मुजे प्रव्रज्या अंगीकार करने का तय है और जिस तरह के तुम निर्बुद्धि हो उस तरह के वो तीर्थंकर भी होंगे उस प्रकार बोलने से हे गौतम ! वो काफी बड़ा तपस्वी होने के बाद भी परमाधामी असुरों में उत्पन्न होंगे। हे भगवंत ! परमाधार्मिक देव वहाँ से मरके कहाँ उत्पन्न होते हैं ? हे भगवंत ! परमाधार्मिक असुर देवता में से बाहर नीकलकर उस सुमति का जीव कहाँ जाएगा ? हे गौतम ! मंदभागी ऐसे उसने अनाचार की प्रशंसा और अभ्युदय करने के लिए पूरे सन्मार्ग के नाश को अनुमोदन किया, उस कर्म के दोष से अनन्त संसार उपार्जन किया। ने भव की उत्पत्ति कहे ? कई पदगल परावर्तन काल तक चार गति समान संसार में से जिसका नीकलने का कोई चारा नहीं तो भी संक्षेप से कुछ भव कहता हूँ वो सुन - इसी जम्बूद्वीप को चोतरफ धीरे हुए वर्तुलाकार लवण समुद्र हैं । उसमें जो जगह पर सिंधु महानदी प्रवेश करती है उस प्रदेश के दक्षिण दिशा में ५५ योजन प्रमाणवाली वेदीका के बीच में साड़े बारह योजन प्रमाण हाथी के कुंभस्थल के आकार समान प्रति संतापदायक नाम की एक जगह है । वो जगह लवण समुद्र के जल से साड़े सात योजन जितना ऊंचा है । वहाँ अति घोर गाढ़ अंधेरेवाली घड़ी संस्थान के आकाशवाली छियालीस गुफा है । उस गुफा में दो-दो के बीच जलचारी मानव रहते हैं । जो वज्रऋषभनारच संघयणवाले, महाबल और पराक्रमवाले साड़े बारह वेंत प्रमाण कायावाले, संख्याता साल के, आयुवाले, जिन्हे मद्य, माँस प्रिय है । वैसे स्वभाव से स्त्री लोलुप, अति बूरे वर्णवाले, सुकुमार, अनिष्ट, कठिन, पथरीले देहवाले, चंडाल के नेता समान भयानक मुखवाले, सींह की तरह घोर नजरवाले, यमराजा समान भयानक, किसीको पीठ न दिखानेवाले, बीजली की तरह निष्ठर प्रहार करनेवाले, अभिमान से मांधाता होनेवाले ऐसे वो अंडगोलिक मानव होते हैं। उनके शरीर में जो अंतरंग गोलिका होती है उसे ग्रहण करके चमरी गाय के श्वेत पूँछ के बाल से वो मुनि दीपरत्नसागर कृत् (महानिशीथ) आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद Page 64
SR No.034707
Book TitleAgam 39 Mahanishith Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 39, & agam_mahanishith
File Size3 MB
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