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________________ आगम सूत्र ३९, छेदसूत्र-५, 'महानिशीथ' अध्ययन/उद्देश/सूत्रांक वचन का उल्लंघन नहीं करना चाहिए । देव और असुरवाले इस जगत को भी तीर्थंकर की वाणी उल्लंघन करने के लायक नहीं है । दूसरी बात यह कि-जब तक उनके साथ चले तब तक उनके दर्शन की बात तो जाने दो लेकिन आलाप-संलाप आदि भी नियमा करना पड़े; तो क्या हम तीर्थंकर की वाणी का उल्लंघन करके गमन करे ? उस प्रकार सोचकर सुमति का हाथ पकड़कर नागिल साधु के साथ में से नीकल गया। सूत्र - ६६३-६६९ ___ नेत्र से देखकर, शुद्ध और निर्जीव भूमि पर बैठा । उसके बाद सुमति ने कहा कि ज्ञान देनेवाले गुरु, माँबाप, बुजुर्ग और बहन या जहाँ प्रत्युत्तर न दे सकते हो वहाँ हे देव ! मैं क्या कहूँ ? उनकी आज्ञा के अनुसार तहत्ति ऐसा करके अपनानी ही हो । यह मेरे लिए इष्ट है या अनिष्ट यह सोचने का अवकाश ही नहीं है । लेकिन आज तो इस विषय में आर्य को इसका उत्तर देना ही पड़ेगा और वो भी कठिन, कर्कश, अनिष्ट, दुष्ट, निष्ठुर शब्द से ही । या तो बड़े भाई के आगे यह मेरी ज़बान कैसे उठती है कि जिसकी गोद में मैं वस्त्र बिना अशुचि से खरड़ित अंगवाला कईं बार खेला है । या तो वो खुद ऐसा अनचाहा बोलने से क्यों नहीं शरमाते ? कि यह कुशील है । और आँख से उन साधुओं को देखना भी नहीं चाहिए । जितने में खुद ने सोचा हुआ अभी तक नहीं बोलता । उतने में इंगित आकार जानने में कुशल बड़े भाई नागिल उसका हृदयगत भाव पहचान गए कि यह सुमति फिझूल में झूठे कषायवाला है । तो कौन-सा प्रत्युत्तर देना ऐसे सोचने लगा। सूत्र-६७०-६७६ बिना कारण बिना अवसर पर क्रोधायमान हुए भले अभी वैसे ही रहे, अभी शायद उसे समज न दी जाए तो भी वो बहुमान्य नहीं करेंगे । तो क्या अभी उसे समजाए कि हाल कालक्षेप करे ? काल पसार होगा तो उसे कषाय शान्त होंगे और फिर मेरी बताई सारी बातों का स्वीकार होगा । या तो हाल का यह अवसर ऐसा है कि उसके संशय को दूर कर सकूँगा । जब तक विशेष समज न दी जाए तब तक इस भद्रिक भाई की समज में कुछ न आएगा । ऐसा सोचकर नागिल छोटे भाई सुमति को कहने लगा-कि हे बन्धु ! मैं तुजे दोष नहीं दे रहा, मैं इसमें अपना ही दोष मानता हूँ कि-हित बुद्धि से सगे भाई को भी कहा जाए तो वो कोपायमान होता है । आँठ कर्म की जाल में फँसे जीव को ही यहाँ दोष है कि चार दोष में से बाहर नीकालनेवाले हितोपदेश उन्हें असर नहीं करता सज्जड़ राग, द्वेष, कदाग्रह, अज्ञान, मिथ्यात्व के दोष से खाए हुए मनवाले आत्मा को हितोपदेश समान अमृत भी कालकूट विष लगता है। सूत्र-६७७ ऐसा सुनकर सुमति ने कहा-तुम ही सत्यवादी हो और इस प्रकार बोल सकते हो । लेकिन साधु के अवर्णवाद बोलना जरा भी उचित नहीं है । वो महानुभाव के दूसरे व्यवहार पर नजर क्यों नहीं करते ? छ?, अट्ठम, चार-पाँच उपवास मासक्षमण आदि तप करके आहार ग्रहण करनेवाले ग्रीष्म काल में आतापना लेते है। और फिर विरासन उत्कटुकासन अलग-अलग तरह के अभिग्रह धारण करना, कष्टवाले तप करना इत्यादी धर्मानुष्ठान आचरण करके माँस और लहूँ जिन्होंने सूखा दिए हैं, इस तरह के गुणयुक्त महानुभाव साधुओं को तुम जैसे महान् भाषा समितिवाले बड़े श्रावक होकर यह साधु कुशीलवाले ऐसा संकल्प करना युक्त नहीं है। उसके बाद नागिल ने कहा कि-हे वत्स ! यह उसके धर्मअनुष्ठान से तु संतोष मत कर । जैसे कि आज मेंअविश्वास से लूँट चूका हूँ, बिना इच्छा से आए हुए पराधीनता से भुगतने के दुःख से, अकाम निर्जरा से भी कर्म का क्षय होता है तो फिर बालतप से कर्मक्षय क्यों न हो? इन सबको बालतपस्वी मानना । क्या तुम्हें उतका उत्सूत्रमार्ग का अल्प सेवनपन नहीं दिखता ? और फिर हे वत्स सुमति ! मुजे यह साधु पर मन से भी सूक्ष्म प्रद्वेष नहीं कि जिससे मैं उनका दोष ग्रहण करूँ । लेकिन तीर्थंकर भगवंत के पास से उस प्रकार अवधारण किया है कि कुशील को मत देखना। मुनि दीपरत्नसागर कृत् (महानिशीथ) आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद Page 62
SR No.034707
Book TitleAgam 39 Mahanishith Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 39, & agam_mahanishith
File Size3 MB
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