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________________ आगम सूत्र ३९, छेदसूत्र-५, 'महानिशीथ' अध्ययन/उद्देश/सूत्रांक नुकसान के बारे में न सोचनेवाले, अपनी मति के अनुसार व्यवहार करनेवाले, स्वच्छंद, ऋद्धि, रस, शाता-गारव आदि में आसक्त हुए, राग-द्वेष, मोह-अंधकार-ममत्त्व आदि में अति प्रतिबद्ध रागवाले, समग्र संयम समान सद्धर्म से पराङ्मुख, निर्दय, लज्जाहीन, पाप की धृणा रहित, करुणा रहित, निर्दय, पाप आचरण करने में अभिनिवेशकदाग्रह बुद्धिवाला, एकान्त में जो अति चंड़, रूद्र और क्रूर अभिग्रह करनेवाली मिथ्यादृष्टि, सर्व संग, आरम्भ, परिग्रह से रहित होकर, त्रिविध-त्रिविध से (मन, वचन, काया से कृत, कारित, अनुमति से) द्रव्य से सामायिक ग्रहण करता है लेकिन भाव से ग्रहण नहीं करता, नाम मात्र ही मस्तक मुंडन करवाते हैं । नाम से ही अणगार-घर छोड़ दिया है । नाम का ही महाव्रतधारी है । श्रमण होने के बावजूद भी विपरीत मान्यता करके सर्वथा उन्मार्ग का सेवन और प्रवर्तन करता है । वो इस प्रकार हम अरिहंत भगवंत की गन्ध, माला, दीपक, संमार्जन, लिंपन, वस्त्र, बलि, धूप आदि की पूजा सत्कार करके हमेशा तीर्थ की प्रभावना करते हैं। उसके अनुसार माननेवाले उन्मार्ग प्रवर्ताते हैं । इस प्रकार उनके कर्तव्य साधु धर्म के अनुरूप नहीं है । हे गौतम ! वचन से भी उनके इस कर्तव्य की अनुमोदना नहीं करनी चाहिए। हे भगवंत ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि वचन से भी उनके इस द्रव्यपूजन की अनुमोदना न करे? हे गौतम ! उनके वचन के अनुसार असंयम की बहुलता और मूल गुण नष्ट हो इससे कर्म का आश्रव हो और फिर अध्यवसाय को लेकर स्थूल और सूक्ष्म शुभाशुभ कर्म प्रकृति का बंध हो, सर्व सावध की की गई विरति समान महाव्रत का भंग हो, व्रत भंग होने से आज्ञा उल्लंघन का दोष लगे, उससे उन्मार्गगामीपन पाए, उससे सन्मार्ग का लोप हो, उन्मार्ग प्रवर्तन करना और सन्मार्ग का विप्रलोप करना यति के लिए महाआशातना समान है । क्योंकि वैसी महाआशातना करनेवाले को अनन्ता काल तक चार गति में जन्म-मरण के फेरे करने पड़ते हैं । इस कारण से वैसे वचन की अनुमोदना नहीं करनी चाहिए । सूत्र- ५१९-५२० द्रव्यस्तव और भावस्तव इन दोनों में भाव-स्तव बहुत गुणवाला है । ''द्रव्यस्तव'' काफी गुणवाला है ऐसा बोलनेवाले की बुद्धि में समजदारी नहीं है । हे गौतम ! छ काय के जीव का हित-रक्षण हो ऐसा व्यवहार करना । यह द्रव्यस्तव गन्ध पुष्पादिक से प्रभुभक्ति करना उन समग्र पाप का त्याग न किया हो वैसे देश-विरतीवाले श्रावक को युक्त माना जाता है । लेकिन समग्र पाप के पच्चक्खाण करनेवाले संयमी साधु को पुष्पादिक की पूजा समान, द्रव्यस्तव करना कल्पता नहीं। सूत्र-५२१-५२२ हे गौतम ! जिस कारण से यह द्रव्यस्तव और भावस्तव रूप दोनों पूजा बत्तीस इन्द्र ने की है तो करने लायक है ऐसा शायद तुम समज रहे हो तो उसमें इस प्रकार समजना । यह तो केवल उनका विनियोग पाने की अभिलाषा समान भाव-स्तव माना है । अविरति ऐसे इन्द्र को भावस्तव (छ काय जीव की त्रिविध त्रिविध से दया स्वरूप) नामुमकीन है । दशार्णभद्र राजा ने भगवंत का आडंबर से सत्कार किया वो द्रव्यपूजा और इन्द्र के सामने मुकाबले में हार गए तब भावस्तव समान दीक्षा अंगीकार की। तब इन्द्र को भी हराया - वो दृष्टांत का यहाँ लागु करना, इसलिए भाव स्तव ही उत्तम है। सूत्र- ५२३-५२६ चक्रवर्ती, सूर्य, चन्द्र, दत्त, दमक आदि ने भगवान को पूछा कि क्या सर्व तरह की ऋद्धि सहित कोई न कर सके उस तरह भक्ति से पूजा-सत्कार किए वो क्या सर्व सावध समजे ? या त्रिविध विरतिवाला अनुष्ठान समजे या सर्व तरह के योगवाली विरती के लिए उसे पूजा माने ? हे भगवंत, इन्द्र ने तो उनकी सारी शक्ति से सर्व प्रकार की पूजा की है । हे गौतम ! अविरतिवाले इन्द्र ने उत्तम तरह की भक्ति से पूजा सत्कार किए हो तो भी वो देश विरति वाले और अविरतिवाले के यह द्रव्य और भावस्तव ऐसे दोनों का विनियोग उसकी योग्यतानुसार जोड़ना । मुनि दीपरत्नसागर कृत् (महानिशीथ) आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद Page 46
SR No.034707
Book TitleAgam 39 Mahanishith Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 39, & agam_mahanishith
File Size3 MB
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