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________________ आगम सूत्र ३९, छेदसूत्र-५, 'महानिशीथ' अध्ययन/उद्देश/सूत्रांक भ्रष्टाचारवाली, नफरतवाली, धृणा करनेलायक, पापी, पापी में भी महा पापीणी, अपवित्रा है । हे गौतम ! स्त्री होशियारी से, भय से, कायरता से, लोलुपता से, उन्माद से, कंदर्प से, अभिमान से, पराधीनता से, बलात्कार से जान-बुझकर यह स्त्र संयम और शील में भ्रष्ट होती है । दूर रहे रास्ते के मार्ग में, गाँव में, नगर में, राजधानी में, वेश त्याग किए बिना स्त्री के साथ अनुचित आचरण करे, बार-बार पुरुष भुगतने की ईच्छा करे, पुरुष के साथ क्रीड़ा करे तो आगे कहने के मताबिक वो पापीणी देखने लायक भी नहीं है। उसी प्रकार किसी साधु ऐसी स्त्री को देखे फिर उन्माद से, अभिमान से, कंदर्प से, पराधीनता से, स्वेच्छा से, जानबुझकर पाप का डर रखे बिना कोई आचार्य, सामान्य साधु, राजा से तारिफ पाए गए, वायु लब्धिवाले, तप लब्धिवाले, योग लब्धिवाले, विज्ञान लब्धिवाले, युग प्रधान, प्रवचन प्रभावक ऐसे मुनिवर भी यदि दूसरी स्त्री के साथ रमण क्रीड़ा करे, उसकी अभिलाषा करे,भुगतना चाहे या भुगते । बार-बार भुगते यावत् अति राग से न करने लायक आचार सेवन करे तो वो मुनि अति दुष्ट, तुच्छ, क्षुद्र लक्षणवाला, अधन्य, अवंदनीय, अदर्शनीय, अहितकारी, अप्रशस्त, अकल्याणकर, मंगल, निंदनीय, गर्हणीय, नफरत करनेलायक दुगंच्छनीय है । वो पापी है और पापी में भी महापापी है वो अति महापापी है, भ्रष्ट शीलवाला, चारित्र से अति भ्रष्ट होनेवाला महापाप कर्म करनेवाला है। इसलिए जब वो प्रायश्चित्त लेने के लिए तैयार हो तब वो उस मंद जाति के अश्व की तरह वज्रऋषभनाराचसंघयणवाले, उत्तम पराक्रमवाले, उत्तम सत्त्ववाले, उत्तम तत्त्व के जानकार, उत्तमवीर्य सामर्थ्यवाले, उत्तम संयोग वाले, उत्तम धर्म-श्रद्धावाले प्रायश्चित्त करते वक्त उत्तम तरह के समाधि मरण की दशा का अहसास करते हैं । हे लिए वैसे साधुओं की महानुभाव अठारह पाप स्थानक का परिहार करनेवाले नव ब्रह्मचर्य की गुप्ति का पालन करनेवाले ऐसे गुणयुक्त उन्हें शास्त्र में बताए हैं। सूत्र-४०५ हे भगवंत ! क्या प्रायश्चित्त से शुद्धि होती है ? हे गौतम ! कुछ लोगों की शुद्धि होती है और कुछ लोगों की नहीं होती । हे भगवन् ! ऐसा किस कारण से कहते हो कि एक की होती है और एक की नहीं होती? हे गौतम ! यदि कोई पुरुष माया, दंभ, छल, ठगाई के स्वभाववाले हो, वक्र आचारवाला हो, वह आत्मा शल्यवाले रहकर, प्रायश्चित्त का सेवन करते हैं । इसलिए उनके अंतःकरण विशुद्धि न होने से कलुषित आशयवाले होते हैं । इसलिए उनकी शुद्धि नहीं होती । कुछ आत्मा सरलतावाली होती है, जिससे जिस प्रकार दोष लगा हो उस प्रकार यथार्थ गुरु को निवेदन करते हैं । इसलिए वो निःशल्य, निःशंक, पूरी तरह साफ दिल से प्रकट आलोचना अंगीकार करके यथोक्त नजरिये से प्रायश्चित्त का सेवन करे । वो निर्मलता निष्कलुषता से विशुद्ध होते हैं इस कारण से ऐसा कहा जाता है कि एक निःशल्य आशयवाला शुद्ध होता है और शल्यवाला शुद्ध नहीं हो सकता। सूत्र-४०६-४०७ हे गौतम ! यह स्त्री, पुरुष के लिए सर्व पापकर्म की सर्व अधर्म की धनवृष्टि समान वसुधारा समान है। मोह और कर्मरज के कीचड़ की खान समान सद्गति के मार्ग की अर्गला-विघ्न करनेवाली, नरक में उतरने के लिए सीड़ी समान, बिना भूमि के विषवेलड़ी, अग्नि रहित उंबाडक-भोजन बिना विसूचिकांत बीमारी समान, नाम रहित व्याधि, चेतना बिना मूर्छा, उपसर्ग बिना मरकी, बेड़ी बिना कैद, रस्सी बिना फाँसी, कारण बिना मौत या अकस्मात मौत, बताई हुई सर्व उपमा स्त्री को लग सकती है । इस तरह के बदसूरत उपनामवाली स्त्री के साथ पुरुष को मन से भी उसके भोग की फिक्र न करना, ऐसा अध्यवसाय न करना, प्रार्थना, धारणा, विकल्प या संकल्प अभिलाषा स्मरण त्रिविध त्रिविध से न करना । हे गौतम ! जैसे कोई विद्या या मंत्र के अधिष्ठायक देव उसके साधक की बूरी दशा कर देते हैं उसी तरह स्त्री भी पुरुष की दुर्दशा करके कलंक उत्पन्न करनेवाली होती है । पाप की हत्या के संकल्प करनेवाले को जिस मुनि दीपरत्नसागर कृत् (महानिशीथ) आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद Page 31
SR No.034707
Book TitleAgam 39 Mahanishith Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 39, & agam_mahanishith
File Size3 MB
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