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________________ आगम सूत्र ३९, छेदसूत्र-५, 'महानिशीथ' अध्ययन/उद्देश/सूत्रांक जाए, पारस पा सके वैसे मन समान सागर में विचरनेवाले को जानना नामुमकीन है । जिसके चित्त स्वाधीन नहीं वो आलोचना किस तरह दे (ले) सके? ऐसे शल्यवाले का शल्य जो उद्धरते हैं वो पल-पल वंदनीय हैं। सूत्र - १५८-१६० स्नेह-राग रहितपन से, वात्सल्यभाव से, धर्मध्यान में उल्लसित करनेवाले, शील के अंग और उत्तम गुण स्थानक को धारण करनेवाला स्त्री और दूसरे कईं बंधन से मुक्त, गृह, स्त्री आदि को कैदखाना माननेवाले, सुविशुद्ध अति निर्मल चित्तयुक्त और जो शल्यरहित करे वो महायशवाला पुरुष दर्शन करने के योग्य, वंदनीय और उत्तम ऐसे वो देवेन्द्र को भी पूजनीय है । कृतार्थी संसारिक सर्व चीज का अनादर करके जो उत्तर ऐसे विरति स्थान को धारण करता है । वो दर्शनीय-पूजनीय है। सूत्र-१६१-१६३ (जिस साध्वीओं ने शल्य की आलोचना नहीं की वो किस तरह से संसार के कट फल पाती है ये बताते हैं।) मैं आलोचना नहीं करूँगी, किस लिए करूँ? या साध्वी थोड़ी आलोचना करे, कईं दोष न करे, साध्वीओं ने जो दोष देखे हो वो ही दोष कहे, मैं तो निरवद्य-निष्पाप से - कहनेवाली हूँ, ज्ञानादिक आलम्बन के लिए दोष सेवन करना पड़े उसमें क्या आलोचना करना ? प्रमाद की क्षमापना माँग लेनेवाली श्रमणी, पाप करनेवाली श्रमणी, बलशक्ति नहीं है ऐसी बातें करनेवाली श्रमणी, लोकविरुद्ध कथा करनेवाली श्रमणी, "दूसरों ने ऐसा पाप किया है उसे कितनी आलोचना है। ऐसा कहकर खुद की आलोचना लेनेवाली, किसी के पास वैसे दोष का प्रायश्चित्त सूना हो उस मुताबिक करे लेकिन अपने दोष का निवेदन न करे और जाति आदि आठ तरह से शंकित हुई श्रमणी (इस तरह शुद्ध आलोचना न ले) सूत्र- १६४-१६५ झूठ बोलने के बाद पकड़े जाने के भय से आलोचना न ले, रस ऋद्धि शाता गारव से दूषित हुई हो और फिर इस तरह के कईं भाव दोष के आधीन, पापशल्य से भरी ऐसी श्रमणी अनन्ता संख्या प्रमाण और अनन्ताकाल से हुई हैं । वो अनन्ती श्रमणी कईं दुःखवाले स्थान में गई हुई हैं। सूत्र - १६६-१६७ अनन्ती श्रमणी जो अनादि शल्य से शल्यित हुई है । वो भावदोष रूप केवल एक ही शल्य से उपार्जित किए घोर, उग्र-उग्रतर ऐसे फल के कटु फल के विरस रस की वेदना भुगतते हुए आज भी नरक में रही है और अभी भावि में भी अनन्ता काल तक वैसी शल्य से उपार्जन किए कटु फल का अहसास करेगी । इसलिए श्रमणीओं को पलभर के लिए भी सूक्ष्म से सूक्ष्म शल्य भी धारण नहीं करना चाहिए। सूत्र - १६८-१६९ धग धग ऐसे शब्द से प्रज्वलित ज्वाला पंक्ति से आकुल महाभयानक भारित महाअग्नि में शरीर सरलता से जलता है । अंगार के ढ़ग में एक डूबकी लगा के फिर जल में, उसमें से स्थल में, उसमें से शरीर फिर से नदी में जाए ऐसे दुःख भूगते कि उससे तो मरना अच्छा लगे। सूत्र-१७०-१७१ परमाधामी देव शस्त्र से नारकी जीव के शरीर के छोटे-छोटे टुकडे कर दे, हमेशा उसे सलुकाई से अग्नि में होमे, सख्त, तीक्ष्ण करवत से शरीर फाड़कर उसमें लूण-उस-साजीखार भरे इससे अपने शरीर को अति शुष्क कर दे तो भी जीने तक अपने शल्य को उतारने के लिए समर्थ नहीं हो सकता। सूत्र - १७२-१७३ जव-खार, हल्दी आदि से अपना शरीर लींपकर मृतःप्राय करना सरल है । अपने हाथों से मस्तक छेदन करके रखना सरल है । लेकिन ऐसा संयम तप करना दुष्कर है, कि जिससे निःशल्य बना जाए । मुनि दीपरत्नसागर कृत् (महानिशीथ) आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद Page 13
SR No.034707
Book TitleAgam 39 Mahanishith Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 39, & agam_mahanishith
File Size3 MB
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