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________________ आगम सूत्र ३९, छेदसूत्र-५, 'महानिशीथ' अध्ययन/उद्देश/सूत्रांक जाए, मुझे फाड़ या चीर दे । भड़भड़ अग्नि में फेंका जाए, मस्तक छेदन किया जाए तो भी मैंने ग्रहण किए नियमव्रत का भंग या शील और चारित्र का एक जन्म खातिर भी मन से भी खंडन नहीं करूँगा ऐसी श्रमणी होकर केवली बनूँगी सूत्र - १३७-१३९ गधे, ऊंट, कूत्ते आदि जातिवाले भव में रागवाली होकर मैंने काफी भ्रमण किया । अनन्ता भव में और भवान्तर में न करनेलायक कर्म किए । अब प्रव्रज्या में प्रवेश करके भी यदि वैसे दुष्ट कर्म करूँ तो फिर घोरअंधकारवाली पाताल पृथ्वी में से मुझे नीकलने का अवकाश मिलना ही मुश्किल हो । ऐसा सुन्दर मानवजन्म राग दृष्टि से विषय में पसार किए जाए तो कईं दुःख का भाजन होता है। सूत्र-१४०-१४४ मानवभव अनित्य है, पल में विनाश पाने के स्वभाववाला, कईं पाप-दंड और दोष के मिश्रणवाला है। उसमें मैं समग्र तीन लोक जिसकी निंदा करे वैसे स्त्री बनकर उत्पन्न हई, लेकिन फीर भी विघ्न और अंतराय रहित ऐसे धर्म को पाकर अब पाप-दोष से किसी भी तरह उस धर्म का विराधन नहीं करूँगी अब शृंगार, राग, विकारयुक्त, अभिलाषा की चेष्टा नहीं करूँगी, धर्मोपदेशक को छोड़कर किसी भी पुरुष की ओर प्रशान्त नजर से भी नहीं देखूगी। उसके साथ आलाप संलाप भी नहीं करूँगी, न बता सके उस तरह का महापाप करके उससे उत्पन्न हुए शल्य की जिस प्रकार आलोचना दी होगी उस प्रकार पालन करूँगी । ऐसी भावना रखकर श्रमणी-केवली बनूँगी। सूत्र - १४५-१४८ उस प्रकार शुद्ध आलोचना देकर-(पाकर) अनन्त श्रमणी निःशल्य होकर, अनादि काल में हे गौतम ! केवलज्ञान पाकर सिद्धि पाकर, क्षमावती-इन्द्रिय का दमन करनेवाली संतोषकर-इन्द्रिय को जीतनेवाली सत्यभाषी -त्रिविध से छ काय के समारम्भ से विरमित तीन दंड़ के आश्रव को रोकनेवाली - पुरुषकथा और संग की त्यागीपुरुष के साथ संलाप और अंगोपांग देखने से विरमित-अपने शरीर की ममता रहित महायशवाली-द्रव्यक्षेत्र काल भाव प्रति अप्रतिबद्ध यानि रागरहित, औरतपन, गर्भावस्था और भवभ्रमण से भयभीत इस तरह की भावनावाली (साध्वीओं को) आलोचना देना। सूत्र-१४९-१५१ जिस तरह इस श्रमणीओं ने प्रायश्चित्त किया उस तरह से प्रायश्चित्त करना, लेकिन किसी को भी माया या दंभ से आलोयणा नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से पापकर्म की वृद्धि होती है, अनादि अनन्त काल से माया-दंभ-कपट दोष से आलोचना करके शल्यवाली बनी हुई साध्वी, हुकूम उठाना पड़े जैसा सेवकपन पाकर परम्परा से छठी नारकी में गई है। सूत्र - १५२-१५३ कुछ साध्वी के नाम कहता हूँ उसे समझ-मान कि जिन्होंने आलोचना की है । लेकिन (माया-कपट समान) भाव-दोष का सेवन करने से विशिष्ट तरह से पापकर्ममल से उसका संयम और शील के अंग खरड़ाये हए हैं । उस निःशल्यपन की प्रशंसा की है जो पलभर भी परमभाव विशुद्धि रहित न हो । सूत्र - १५४-१५५ इसलिए हे गौतम ! कुछ स्त्रीयों को अति निर्मल, चित्त-विशुद्धि भवान्तर में भी नहीं होती कि जिससे वो निःशल्य भाव पा सके, कुछ श्रमणी छठू-अठुम, चार उपवास, पाँच उपवास इस तरह बारबार उपवास से शरीर सूखा देते हैं तो भी सराग भाव की आलोचना करती नहीं-छोड़ती नहीं। सूत्र-१५६-१५७ अनेक प्रकार के विकल्प देकर कल्लोल श्रेणी तरंग में अवगाहन करनेवाले दुःख से करके अवगाह किया मुनि दीपरत्नसागर कृत् (महानिशीथ) आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद Page 12
SR No.034707
Book TitleAgam 39 Mahanishith Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 39, & agam_mahanishith
File Size3 MB
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