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________________ आगम सूत्र १३, उपांगसूत्र-२, 'राजप्रश्निय' किन्तु कहीं भी उसे आग दिखाई नहीं दी। तब उस पुरुष ने कमर कसी और कुल्हाड़ी लेकर उस काष्ठ के दो टुकड़े कर दिये । फिर उन टुकड़ों को भी सभी ओर से अच्छी तरह देखा, किन्तु कहीं आग दिखाई नहीं दी। इसी प्रकार फिर तीन, चार, पाँच यावत् संख्यात टुकड़े किये परन्तु देखने पर भी उनमें कहीं आग दिखाई नहीं दी। - इसके बाद जब उस पुरुष को काष्ठ के दो से लेकर असंख्यात टुकड़े करने पर भी कहीं आग दिखाई नहीं दी तो वह श्रान्त, क्लान्त, खिन्न और दुःखित हो, कुल्हाड़ी को एक ओर रख और कमर को खोलकर मन-ही-मन इस प्रकार बोला-अरे ! मैं उन लोगों के लिए भोजन नहीं बना सका | अब क्या करूँ | इस विचार से अत्यन्त निराश, दुःखी, चिन्तित, शोकातूर हो हथेली पर मुँह को टिकाकर आर्तध्यानपूर्वक नीचे जमीन में आँखे गाड़कर चिंता में डूब गया । लकड़ियों को काटने के पश्चात् वे लोग वहाँ आए जहाँ अपना साथी था और उसको निराश, दुःखी यावत् चिन्ताग्रस्त देखकर उससे पूछा-देवानुप्रिय ! तुम क्यों निराश, दुःखी यावत् चिन्ता में डूबे हुए हो? तब उस पुरुष ने बताया कि देवानुप्रियो ! आप लोगों ने मुझसे कहा था, यावत् जंगल में चले गए । कुछ समय बाद मैंने विचार किया कि आप लोगों के लिए भोजन बना लूँ । ऐसा विचार कर जहाँ अंगीठी थी, वहाँ पहुँचा यावत् आर्तध्यान कर रहा हूँ। उन मनुष्यों में कोई एक छेक, दक्ष, प्राप्तार्थ यावत् उपदेश लब्ध पुरुष था । उस पुरुष ने अपने दूसरे साथी लोगों से इस प्रकार कहा हे देवानुप्रियो ! आप जाओ और स्नान, बलिकर्म आदि करके शीघ्र आ जाओ। तब तक मैं आप लोगों के लिए भोजन तैयार करता हूँ। ऐसा कहकर उसने अपनी कमर कसी, कुल्हाड़ी लेकर सर बनाया, सर से अरणिकाष्ठ को रगड़कर आग की चिनगारी प्रगट की । फिर उसे धौंक कर सुलगाया और फिर उन लोगों के लिए भोजन बनाया । इतने में स्नान आदि करने गए पुरुष वापस स्नान करके, बलिकर्म करके यावत् प्रायश्चित्त करके उस भोजन बनाने वाले पुरुष के पास आ गए । तत्पश्चात् उस पुरुष ने सुखपूर्वक अपने-अपने आसनों पर बैठे उन लोगों के सामने उस विपुल अशन, पान, खाद्य, स्वाध रूप चार प्रकार का भोजन रखा । वे उस विपुल अशन आदि रूप चारों प्रकार के भोजन का स्वाद लेते हुए, खाते हुए यावत् विचरने लगे । भोजन के बाद आचमन-कुल्ला आदि करके स्वच्छ, शुद्ध होकर अपने पहले साथी से इस प्रकार बोले-हे देवानुप्रिय ! तुम जड़-अनभिज्ञ, मूढ़, अपंडित, निर्विज्ञान और अनुपदेशलब्ध हो, जो तुमने काठ के टुकड़ों में आग देखना चाहा । इसी प्रकार की तुम्हारी भी प्रवृत्ति देखकर मैंने यह कहा-हे प्रदेशी ! तुम उस तुच्छ कठियारे से भी अधिक मूढ़ हो कि शरीर के टुकड़ेटुकड़े करके जीव को देखना चाहते हो । सूत्र - ७२ प्रदेशी राजा ने कहा-भन्ते ! आप जैसे छेक, दक्ष, बुद्ध, कुशल, बुद्धिमान, विनीत, विशिष्ट ज्ञानी, विवेक संपन्न, उपदेशलब्ध पुरुष का इस अति विशाल परिषद् के बीच मेरे लिए इस प्रकार के निष्ठुर शब्दों का प्रयोग करना, मेरी भर्त्सना करना, मुझे प्रताड़ित करना, धमकाना क्या उचित है ? केशी कुमारश्रमण ने कहा-हे प्रदेशी ! जानते हो कि कितनी परिषदायें कही गई हैं ? प्रदेशी-जी हाँ, जानता हूँ चार परिषदायें हैं-क्षत्रिय, गाथापति, ब्राह्मण और ऋषि परिषदा । प्रदेशी ! तुम यह भी जानते हो कि इन चार परिषदाओं के अपराधियों के लिए क्या दण्डनीति बताई गई है ? प्रदेशी-हाँ, जानता हूँ | जो क्षत्रिय-परिषद् का अपराध करता है, उसके या तो हाथ, पैर या शिर काट दिया जाता है, अथवा उसे शूली पर चढ़ा देते हैं या एक ही प्रहार से या कूचलकर प्राणरिहत कर दिया जाता है-जो गाथापति-परिषद् का अपराध करता है, उसे घास से अथवा पेड़ के पत्तों से अथवा पलाल-पुआल से लपेट कर अग्नि में झोंक दिया जाता है । जो ब्राह्मण-परिषद् का अपराध करता है, उसे अनिष्ट, रोषपूर्ण, अप्रिय या अमणाम शब्दों से उपालम्भ देकर अग्नितप्त लोहे से कुंडिका चिह्न अथवा कुत्ते के चिह्न से लांछित कर दिया जाता है अथवा निर्वासित कर दिया जाता है । जो ऋषि-परिषद् का अपमान करता है, उसे न अति अनिष्ट यावत् न अति अमनोज्ञ शब्दों द्वारा उपालम्भ दिया जाता है । केशी कुमारश्रमण-इस प्रकार की दण्डनीति को जानते हुए भी हे प्रदेशी ! तुम मेरे प्रति विपरीत, परितापजनक, प्रतिकूल, 7 .0 मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (राजप्रश्चिय)- आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 52
SR No.034680
Book TitleAgam 13 Rajprashniya Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages62
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 13, & agam_rajprashniya
File Size3 MB
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