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________________ आगम सूत्र ६, अंगसूत्र-६, 'ज्ञाताधर्मकथा' श्रुतस्कन्ध/वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक साथ, घुड़सवारी के लिए नीकला और उसी खाई के पानी के पास पहुँचा । तब जितशत्रु राजा ने खाई के पानी की अशुभ गन्ध से घबराकर अपने उत्तरीय वस्त्र से मुँह ढंक लिया । वह एक तरफ चला गया और साथी राजा, ईश्वर यावत् सार्थवाह वगैरह से इस प्रकार कहने लगा-'अहो देवानुप्रियो ! यह खाई का पानी वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श से अमनोज्ञ-अत्यन्त अशुभ है । जैसे किसी सर्प का मृत कलेवर हो, यावत् उससे भी अधिक अमनोज्ञ है, अमनोज्ञ गन्ध वाला है । तत्पश्चात् वे राजा, ईश्वर यावत् सार्थवाह आदि उस प्रकार बोले-स्वामिन् ! आप जो ऐसा कहते हैं सो सत्य ही है कि-अहो ! यह खाई का पानी वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श से अमनोज्ञ है। यह ऐसा अमनोज्ञ है, जैसे साँप आदि का मृतक कलेवर हो, यावत् उससे भी अधिक अतीव अमनोज्ञ गन्ध वाला है। तब राजा जितशत्रु ने सुबुद्धि अमात्य से कहा-'अहो सुबुद्धि ! यह खाई का पानी वर्ण आद से अमनोज्ञ है, जैसे किसी सर्प आदि का मत कलेवर हो, यावत उससे भी अधिक अत्यन्त अमनोज्ञ गंध वाला है । तब सबद्धि अमात्य इस कथन का समर्थन न करता हआ मौन रहा। तब जितशत्र राजा ने सबद्धि अमात्य से दूसरी बार और तीसरी बार इसी प्रकार कहा-'अहो सुबुद्धि ! यह खाई का पानी अमनोज्ञ है इत्यादि पूर्ववत् ।' तब सुबुद्धि अमात ने जितशत्रु के दूसरी बार और तीसरी बार ऐसा कहने पर इस प्रकार कहा-'स्वामिन् ! मुझे इस खाई के पानी के विषय में कोई विस्मय नहीं है । क्योंकि शुभ शब्द के पुद्गल भी अशुभ रूप में परिणत हो जाते हैं, इत्यादि पूर्ववत् यावत् मनुष्य के प्रयत्न से और स्वाभाविक रूप से भी पुद्गलों में परिणमन होता रहता है; ऐसा कहा है। तत्पश्चात् जितशत्रु राजा ने सुबुद्धि अमात्य से इस प्रकार कहा-देवानुप्रिय ! तुम अपने आपको, दूसरे को और स्व-पर दोनों को असत् वस्तु या वस्तुधर्म की उद्भावना करके और मिथ्या अभिनिवेश करके भ्रम में मत डालो, अज्ञानियों को ऐसी सीख न दो । जितशत्रु की बात सूनने के पश्चात् सुबुद्धि को इस प्रकार का अध्यवसायविचार उत्पन्न हुआ-अहो ! जितशत्रु राजा सत्, तत्त्वरूप, तथ्य, अवितथ और सद्भूत जिन भगवान द्वारा प्ररूपित भावों को नहीं जानता-नहीं अंगीकार करता । अत एव मेरे लिए यह श्रेयस्कर होगा कि मैं जितशत्रु राजा को सत् तत्त्वरूप, तथ्य, अवितथ और सद्भूत जिनेन्द्र प्ररूपित भावों को समझाऊं और इस बात को अंगीकार कराऊं। सुबुद्धि अमात्य ने इस प्रकार विचार किया । विचार करके विश्वासपात्र पुरुषों से खाई के मार्ग के बीच की कुंभार की दुकान से नये घड़े और वस्त्र लिए । घड़े लेकर जब कोई विरले मनुष्य चल रहे थे और जब लोग अपनेअपने घरों में विश्राम लेने लगे थे, ऐसे संध्याकाल के अवसर पर जहाँ खाई का पानी था, वहाँ आकर पानी ग्रहण करवाया । उसे नये घड़ों में गलवाया, नये घड़ों में डलवाकर उन घड़ों को लांछित-मुद्रित करवाया । फिर सात रात्रि -दिन उन्हें रहने दिया। सात रात्रि-दिन के बाद उस पानी को दूसरी बार कोरे घडे में छनवाया और नये घडों में डलवाया । उनमें ताजा राख डलवाई और फिर उन्हें लांछित-मुद्रित करवा दिया। सात रात-दिन रखने के बाद तीसरी बार नवीन घड़ों में वह पानी डलवाया, यावत् सात रात-दिन उसे रहने दिया । इस तरह से, इस उपाय से, बीच-बीच में गलवाया, बीच-बीच में कोरे घड़ों में डलवाया और बीच-बीच में रखवाया जाता हआ वह पानी सातसात रात्रि-दिन तक रख छोड़ा जाता था। तत्पश्चात् वह खाई का पानी सात सप्ताह में परिणत होता हुआ उदकरत्न बन गया । वह स्वच्छ, पथ्यआरोग्यकारी, जात्य, हल्का हो गया; स्फटिक मणि के सदृश मनोज्ञ वर्ण से युक्त, मनोज्ञ गंध से युक्त, रस से युक्त और स्पर्श से युक्त, आस्वादन करने योग्य यावत् सब इन्द्रियों को मति आह्लाद उत्पन्न करने वाला हो गया । तत्पश्चात् सुबुद्धि अमात्य उस उदकरत्न के पास पहुँचकर हथेली में लेकर उसका आस्वादन किया । उसे मनोज्ञ वर्ण से युक्त, गंध से युक्त, रस से युक्त, स्पर्श से युक्त, आस्वादन करने योग्य यावत् सब इन्द्रियों को और गात्र को अतिशय आह्लादजनक जानकर हृष्ट-तुष्ट हुआ । फिर उसने जल को सँवारने वाले द्रव्यों से सँवारा-जितशत्रु राजा के जलगृह के कर्मचारी को बुलवाकर कहा- देवानुप्रिय ! तुम यह उदकरत्न ले जाओ । इसे ले जाकर राजा जितशत्रु के भोजन की वेला में उन्हें पीने के लिए देना ।' तत्पश्चात् जलगृह के उस कर्मचारी ने सुबुद्धि के इस अर्थ को अंगीकार किया । अंगीकार करके वह उदकरत्न ग्रहण किया और ग्रहण करके जितशत्रु राजा के भोजन की मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (ज्ञाताधर्मकथा)- आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 99
SR No.034673
Book TitleAgam 06 Gnatadharm Katha Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages162
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 06, & agam_gyatadharmkatha
File Size4 MB
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