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________________ आगम सूत्र ६, अंगसूत्र-६, 'ज्ञाताधर्मकथा' श्रुतस्कन्ध/वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक मंत्रियों को बुलाया । बुलाकर इस प्रकार कहा-'हे देवानुप्रिय ! मैंने शुक अनगार से धर्म सूना है और उस धर्म की मैंने ईच्छा की है । वह धर्म मुझे रुचा है । अत एव हे देवानुप्रियो ! मैं संसार के भय से उद्विग्न होकर दीक्षा ग्रहण कर रहा हूँ । देवानुप्रियो ! तुम क्या करोगे ? कहाँ रहोगे ? तुम्हारा हित और अभीष्ट क्या है ? अथवा तुम्हारी हार्दिक ईच्छा क्या है ?' तब वे पंथक आदि मंत्री शैलक राजा से इस प्रकार कहने लगे-'हे देवानुप्रिय ! यदि आप संसार के भय से उद्विग्न होकर यावत् प्रव्रजित होना चाहते हैं, तो हे देवानुप्रिय ! हमारा दूसरा आधार कौन है ? हमारा आलंबन कौन है ? अत एव हे देवानुप्रिय ! हम भी संसार के भय से उद्विग्न होकर दीक्षा अंगीकार करेंगे । हे देवानुप्रिय ! जैसे आप यहाँ गृहावस्था में बहुत से कार्यों में, कुटुम्ब सम्बन्धी विषयों में, मन्त्रणाओं में, गुप्त एवं रहस्यमय बातों में, कोई भी निश्चय करने में एक और बार-बार पूछने योग्य है, मेढ़ी, प्रमाण, आधार, आलंबन और चक्षुरूप-मार्गदर्शक हैं, मेढी प्रमाण आधार आलंबन एवं नेत्र समान है यावत आप मार्गदर्शक हैं, उसी प्रकार दीक्षित होकर भी आप बहुत-से कार्यों में यावत् चक्षुभूत होंगे। तत्पश्चात् शैलक राजा ने पंथक प्रभृति पाँच सौं मंत्रियों से इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रियो ! यदि तुम संसार के भय से उद्विग्न हुए हो, यावत् दीक्षा ग्रहण करना चाहते हो तो, देवानुप्रियो ! जाओ और अपने-अपने कुटुम्बों में अपने-अपने ज्येष्ठ पुत्रों को कुटुम्ब के मध्य में स्थापित करके अर्थात् परिवार का समस्त उत्तरदायित्व उन्हें सौंप कर हजार पुरुषों द्वारा वहन करने योग्य शिविकाओं पर आरूढ़ होकर मेरे समीप प्रकट होओ।' यह सुनकर पाँच सौ मंत्री अपने-अपने घर चले गए और राजा के आदेशानुसार कार्य करके शिबिकाओं पर आरूढ़ होकर वापिस राजा के पास प्रकट हुए-आ पहुँचे । तत्पश्चात् शैलक राजा ने पाँच सौ मंत्रियों को अपने पास आया देखा । देखकर हृष्टतुष्ट होकर कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया । बुलाकर इस प्रकार कहा-'देवानुप्रियो ! शीघ्र ही मंडुक कुमार के महान् अर्थ वाले राज्याभिषेक की तैयारी करो ।' कौटुम्बिक पुरुषों ने वैसा ही किया । शैलक राजा ने राज्याभिषेक किया। मंडुक कुमार राजा हो गया, यावत् सुखपूर्वक विचरने लगा । तत्पश्चात् शैलक ने मंडुक राजा से दीक्षा लेने की आज्ञा मांगी । तब मंडुक राजा ने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया । बुलाकर इस प्रकार कहा-' शीघ्र ही शैलकपुर नगर को स्वच्छ और सिंचित करके सुगंध की बट्टी के समान करो और कराओ । ऐसा करके और कराकर यह आज्ञा मुझे वापिस सौंपो अर्थात् आज्ञानुसार कार्य हो जाने की मुझे सूचना दो।' तत्पश्चात् मंडुक राजाने दुबारा कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया । बुलाकर इस प्रकार कहा-'शीघ्र ही शैलक महाराजा के महान् अर्थवाले यावत् दीक्षाभिषेक की तैयारी करो।' जैसे मेघकुमार के प्रकरणमें प्रथम अध्ययन में कहा था, उसी प्रकार यहाँ भी कहना । विशेषता यह है कि पद्मावती देवी ने शैलक के अग्रकेश ग्रहण किये । सभी दीक्षार्थी प्रतिग्रह-पात्र आदि ग्रहण करके शिबिका पर आरूढ़ हए । शेष वर्णन पूर्ववत् समझना । यावत् राजर्षि शैलक ने दीक्षित होकर सामायिक से आरम्भ करके ग्यारह अंगों का अध्ययन किया । अध्ययन करके बहुत से उपवास आदि तपश्चरण करते हुए विचरने लगे । तत्पश्चात् शुक अनगार ने शैलक अनगार को पंथक प्रभृति पाँच सौ अनगार शिष्य के रूप में प्रदान किये । फिर शुक मुनि किसी समय शैलकपुर नगर से और सुभूमि-भाग उद्यान से बाहर नीकले । नीकलकर जनपदों में विचरने लगे । तत्पश्चात् वह शुक अनगार एक बार किसी समय एक हजार अनगारों के साथ अनुक्रम से विचरते हुए, ग्रामानुग्राम विहार करते हुए अपना अन्तिम समय समीप आया जानकर पुंडरीक पर्वत पर पधारे । यावत् केवलज्ञान केवलदर्शन प्राप्त करके सिद्ध यावत् दुःखों रहित हो गए। सूत्र-६९ तत्पश्चात् प्रकृति से सुकुमार और सुखभोग के योग्य शैलक राजर्षि के शरीर में सदा अन्त, प्रान्त, तुच्छ, रूक्ष, अरस, विरस, ठंडा-गरम, कालातिक्रान्त और प्रमाणातिक्रान्त भोजन-पान मिलने के कारण वेदना उत्पन्न हो गई । वह वेदना उत्कट यावत् विपुल, कठोर, प्रगाढ़, प्रचंड एवं दुस्सह थी । उनका शरीर खुजली और दाह उत्पन्न करने वाले पित्तज्वर से व्याप्त हो गया । तब वह शैलक राजर्षि उस रोगांतक से शुष्क हो गए । तत्पश्चात् शैलक राजर्षि किसी समय अनुक्रम से विचरते हुए यावत् जहाँ सुभूमिभाग नामक उद्यान था, वहाँ आकर विचरने लगे । मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (ज्ञाताधर्मकथा)- आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 59
SR No.034673
Book TitleAgam 06 Gnatadharm Katha Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages162
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 06, & agam_gyatadharmkatha
File Size4 MB
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