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________________ आगम सूत्र ६, अंगसूत्र-६, 'ज्ञाताधर्मकथा' श्रुतस्कन्ध/वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक हए स्थविर भगवंतों ने मेघ अनगार को क्रमशः कालगत देखा । देखकर परिनिर्वाणनिमित्तक कायोत्सर्ग करके मेघ मुनि के उपकरण ग्रहण किये और विपुल पर्वत से धीरे-धीरे नीचे उतरे । जहाँ गुणशील चैत्य था और जहाँ श्रमण भगवान महावीर थे वहीं पहुँचे । श्रमण भगवान महावीर को वन्दना की, नमस्कार किया । इस प्रकार बोले-आप देवानुप्रिय के अन्तेवासी मेघ अनगार स्वभाव से भद्र और यावत् विनीत थे । वह देवानुप्रिय से अनुमति लेकर गौतम आदि साधुओं और साध्वीयों को खमा कर हमारे साथ विपुल पर्वत पर धीरे-धीरे आरूढ़ हुए । स्वयं ही सघन मेघ के समान कृष्णवर्ण पृथ्वीशिलापट्टक का प्रतिलेखन किया । प्रतिलेखन करके भक्त-पान का प्रत्याख्यान कर दिया और अनुक्रम से कालधर्म को प्राप्त हुए । हे देवानुप्रिय ! यह है मेघ अनगार के उपकरण । सूत्र-४१ 'भगवन्!' इस प्रकार कहकर भगवान गौतम ने श्रमण भगवान महावीर को वन्दना की, नमस्कार किया। वन्दन-नमस्कार करके इस प्रकार कहा-'देवानुप्रिय के अन्तेवासी मेघ अनगार थे । भगवन् ! यह मेघ अनगार काल-मास में काल करके किस गति में गए? और किस जगह उत्पन्न हुए? 'हे गौतम!' इस प्रकार कहकर श्रमण भगवान महावीर ने भगवान गौतम से कहा-हे गौतम ! मेरा अन्तेवासी मेघ नामक अनगार प्रकृति से भद्र यावत् विनीत था । उसने तथारूप स्थविरों से सामायिक से प्रारम्भ करके ग्यारह अंगों का अध्ययन किया । अध्ययन करके बारह भिक्षु-प्रतिमाओं का और गुणरत्नसंवत्सर नामक तप का काय से स्पर्श करके यावत् कीर्तन करके, मेरी आज्ञा लेकर गौतम आदि स्थविरों को खमाया । खमाकर तथारूप यावत् स्थविरों के साथ विपुल पर्वत पर आरोहण किया । दर्भ का संथारा बिछाया । फिर दर्भ के संथारे पर स्थित होकर स्वयं ही पाँच महाव्रतों का उच्चारण किया, बारह वर्ष तक साधुत्व-पर्याय का पालन करके एक मास की संलेखना से अपने शरीर को क्षीण करके, साठ भक्त अनशन से छेदन करके, आलोचना-प्रतिक्रमण करके, शल्यों को निर्मूल करके समाधि को प्राप्त होकर, काल-मास में मृत्यु को प्राप्त करके, ऊपर चन्द्र, सूर्य, ग्रहगण, नक्षत्र और तारा रूप ज्योतिष्चक्र से बहुत योजन, बहुत सैकड़ों योजन, बहुत हजारों योजन, बहुत लाखों योजन, बहुत करोड़ों योजन और बहुत कोड़ाकोड़ी योजन लाँघकर, ऊपर जाकर सौधर्म ईशान सनत्कुमार माहेन्द्र ब्रह्मलोक लान्तक महाशुक्र सहस्रार आनत प्राणत आरण और अच्युत देवलोकों तथा तीन सौ अठारह नवग्रैवेयक के विमानावासों को लाँघकर वह विजय नामक अनुत्तर महाविमान में देव के रूप में उत्पन्न हुआ है। उस विजय नामक अनुत्तर विमान में किन्हीं-किन्हीं देवों की तैंतीस सागरोपम की स्थिति कही है। उसमें मेघ नामक देव की भी तैंतीस सागरोपम की स्थिति है । गौतम स्वामी ने पुनः प्रश्न किया-भगवन् ! वह मेघ देवलोक से आयु का क्षय करके, आयुकर्म की स्थिति का वेदन द्वारा क्षय करके तथा भव का क्षय करके तथा देवभव के शरीर का त्याग करके अथवा देवलोक से च्यवन करके किस गति में जाएगा? किस स्थान पर उत्पन्न होगा? भगवान ने उत्तर दिया-हे गौतम ! महाविदेह वर्ष में सिद्धि प्राप्त करेगा-समस्त मनोरथों को सम्पन्न करेगा, केवल-ज्ञान से समस्त पदार्थों को जानेगा, समस्त कर्मों से मुक्त होगा और परिनिर्वाण प्राप्त करेगा, अर्थात् कर्मजनित समस्त विकारों से रहित हो जाने के कारण स्वस्थ होगा और समस्त दुःखों का अन्त करेगा। श्री सुधर्मास्वामी अपने प्रधान शिष्य जम्बू स्वामी से कहते हैं-इस प्रकार हे जम्बू ! श्रमण भगवान महावीर ने, जो प्रवचन की आदि करने वाले, तीर्थ की संस्थापना करने वाले यावत् मुक्ति को प्राप्त हुए हैं, आप्त गुरु को चाहिए की अविनीत शिष्य को उपालम्ब दे, इस प्रयोजन से प्रथम ज्ञाताध्ययन का यह अर्थ कहा है । ऐसा मैं कहता हूँ। अध्ययन-१ का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (ज्ञाताधर्मकथा)- आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 37
SR No.034673
Book TitleAgam 06 Gnatadharm Katha Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages162
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 06, & agam_gyatadharmkatha
File Size4 MB
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