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________________ आगम सूत्र ६, अंगसूत्र - ६, 'ज्ञाताधर्मकथा ' श्रुतस्कन्ध/वर्ग/अध्ययन / सूत्रांक तत्पश्चात् श्रमण भगवान महावीर ने मेघकुमार को और उस महती परिषद् को परिषद् के मध्य में स्थित होकर विचित्र प्रकार के श्रुतधर्म और चारित्रधर्म का कथन किया । जिस प्रकार जीव कर्मों से बद्ध होते हैं, जिस प्रकार मुक्त होते हैं और जिस प्रकार संक्लेश को प्राप्त होते हैं, यावत् धर्मदेशना सूनकर परिषद् वापिस लौट गई। सूत्र - ३१ तत्पश्चात् श्रमण भगवान महावीर के पास मेघकुमारने धर्म श्रवण करके, उसे हृदयमें धारण करके, हृष्टतुष्ट होकर श्रमण भगवान महावीर को तीन बार दाहिनी ओर से आरम्भ करके प्रदक्षिणा की। प्रदक्षिणा करके वन्दन-नमस्कार किया । इस प्रकार कहा- भगवन् ! मैं निर्ग्रन्थ प्रवचन पर श्रद्धा करता हूँ, उसे सर्वोत्तम स्वीकार करता हूँ, मैं उस पर प्रतीति करता हूँ । मुझे निर्ग्रन्थ प्रवचन रुचता है, मैं निर्ग्रन्थ प्रवचन को अंगीकार करना चाहता हूँ, पुनः पुनः ईच्छा की है, भगवन् ! यह ईच्छित और पुनः पुनः ईच्छित है । यह वैसा ही है जैसा आप कहते हैं । विशेष बात यह है कि हे देवानुप्रिय ! मैं अपने माता-पिता की आज्ञा ले लूँ, तत्पश्चात् मुण्डित होकर दीक्षा ग्रहण करूँगा । भगवान ने कहा- देवानुप्रिय ! जिससे तुझे सुख उपजे वह कर, उसमें विलम्ब न करना । तत्पश्चात् मेघकुमार ने श्रमण भगवान महावीर को वन्दन किया, नमस्कार किया, वन्दन नमस्कार करके जहाँ चार घंटाओं वाला अश्वरथ था, वहाँ आया। आकर चार घंटाओं वाले अश्व रथ पर आरूढ़ हुआ। आरूढ़ होकर महान सुभटों और बड़े समूह वाले परिवारके साथ राजगृह के बीचों-बीच होकर अपने घर आया । चार घंटाओं वाले अश्व-रथ से उतरा । उतरकर जहाँ उसके माता-पिता थे, वहीं पहुँचा। पहुँचकर माता-पिता के पैरों में प्रणाम किया । प्रणाम करके उसने इस प्रकार कहा- 'हे माता-पिता ! मैंने श्रमण भगवान महावीर के समीप धर्म श्रवण किया है और मैंने उस धर्म की ईच्छा की है, बार-बार ईच्छा की है । वह मुझे रुचा है ।' तब मेघकुमार के माता-पिता इस प्रकार बोले- पुत्र ! तुम धन्य हो, पुत्र! तुम पूरे पुण्यवान हो, हे पुत्र ! तुम कृतार्थ हो कि तुमने श्रमण भगवान महावीर के निकट धर्म श्रवण किया है और वह धर्म तुम्हें इष्ट, पुनः पुनः इष्ट और रुचिकर भी हुआ है ।' तत्पश्चात् मेघकुमार माता-पिता से दूसरी बार और तीसरी बार इस प्रकार कहने लगा 'हे माता-पिता! मैंने श्रमण भगवान महावीर से धर्म श्रवण किया है। उस धर्म की मैंने ईच्छा की है, बार-बार ईच्छा की है, वह मुझे रुचिकर हुआ है । अत एव है माता-पिता ! मैं आपकी अनुमति प्राप्त करके श्रमण भगवान महावीर के समीप मुण्डित होकर, गृहवास त्याग कर अनगारिता की प्रव्रज्या अंगीकार करना चाहता हूँ-मुनिदीक्षा लेना चाहता हूँ । तब धारिणी देवी इस अनिष्ट, अप्रिय, अमनोज्ञ और अमणाम, पहले कभी न सूनी हुई, कठोर वाणी को सूनकर और हृदय में धारण करके महान् पुत्र-वियोग के मानसिक दुःख से पीड़ित हुई। उसके रोमकूपों में पसीना आकर अंगों से पसीना झरने लगा । शोक की अधिकता से उसके अंग काँपने लगे । वह निस्तेज हो गई । दीन और विमनस्क हो गई । हथेली से मली हुई कमल की माला के समान हो गई। में प्रव्रज्या अंगीकार करना चाहता हूँ यह शब्द सूनने के क्षण में ही वह दुःखी और दुर्बल हो गई । वह लावण्यरहित हो गई, कान्तिहीन हो गई, श्रीविहीन हो गई, शरीर दुर्बल होने से उसके पहने हुए अलंकार अत्यन्त ढीले हो गए, हाथों में पहने हुए उत्तम वलय खिसक कर भूमि पर जा पड़े और चूर-चूर हो गए । उसका उत्तरीय वस्त्र खिसक गया । सुकुमार केशपाश बिखर गया । मूर्च्छा के वश होने से चित्त नष्ट हो गया वह बेहोश हो गई । परशु से काटी हुई चंपकलता के समान तथा महोत्सव सम्पन्न हो जाने के पश्चात् इन्द्रध्वज के समान प्रतीत होने लगी । उसके शरीर के जोड़ ढीले पड़ गए। ऐसी अवस्था होने से वह धारिणी देवी सर्व अंगों से धस्-धड़ाम से पृथ्वीतल पर गिर पड़ी । तत्पश्चात् वह धारिणी देवी, संभ्रम के साथ शीघ्रता से सुवर्णकलश के मुख से नीकली हुई शीतल की निर्मल धारा से सिंचन की गई अर्थात् उस पर ठंडा जल छिड़का गया। अत एव उसका शरीर शीतल हो गया । उत्क्षेपक से, तालवृन्त से तथा वीजनक से उत्पन्न हुई तथा जलकणों से युक्त वायु से अन्तःपुर के परिजनों द्वारा उसे आश्वासन दिया गया । तब वह होश में आई । अब धारिणी देवी मोतियों की लड़ी के समान अश्रुधार से अपने स्तनों को सींचने भिगोने लगी। वह दयनीय, विमनस्क और दीन हो गई। वह रुदन करती हुई, क्रन्दन करती हुई, मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (ज्ञाताधर्मकथा )" आगमसूत्र - हिन्द- अनुवाद" Page 22
SR No.034673
Book TitleAgam 06 Gnatadharm Katha Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages162
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 06, & agam_gyatadharmkatha
File Size4 MB
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