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________________ आगम सूत्र ५, अंगसूत्र-५, 'भगवती/व्याख्याप्रज्ञप्ति-1' शतक/ शतकशतक/उद्देशक/ सूत्रांक वायुकाय मरकर (जब दूसरी पर्याय में जाता है, तब) सशरीरी होकर जाता है, या अशरीरी होकर जाता है ? गौतम! वह कथंचित् शरीरसहित होकर जाता है, कथंचित् शरीररहित होकर जाता है । भगवन् ! ऐसा आप किस कारण से कहते हैं ? गौतम ! वायुकाय के चार शरीर कहे गए हैं; वे इस प्रकार-औदारिक, वैक्रिय, तैजस और कार्मण । इनमें से वह औदारिक और वैक्रिय शरीर को छोड़कर दूसरे भव में जाता है, इस अपेक्षा से वह शरीररहित जाता है और तैजस तथा कार्मण शरीर को साथ लेकर जाता है, इस अपेक्षा से वह शरीरसहित जाता है । इसलिए हे गौतम ! ऐसा कहा जाता है कि वायुकाय मरकर दूसरे भव में कथंचित् सशरीरी जाता है और कथंचित् अशरीरी जाता है। सूत्र - १०९ भगवन् ! जिसने संसार का निरोध नहीं किया, संसार के प्रपंचों का निरोध नहीं किया, जिसका संसार क्षीण नहीं हुआ, जिसका संसार-वेदनीय कर्म क्षीण नहीं हुआ, जिसका संसार व्युच्छिन्न नहीं हुआ, जिसका संसार-वेदनीय कर्म व्यच्छिन्न नहीं हआ, जो निष्ठितार्थ नहीं हआ, जिसका कार्य समाप्त नहीं हआ; ऐसा मतादी (अचित्त, निर्दोष आहार करने वाला) अनगार पुनः मनुष्यभव आदि भवों को प्राप्त होता है ? हाँ, गौतम ! पूर्वोक्त स्वरूप वाला मृतादीनिर्ग्रन्थ फिर मनुष्यभव आदि भवों को प्राप्त होता है। सूत्र-११० भगवन् ! पूर्वोक्त निर्ग्रन्थ के जीव को किस शब्द से कहना चाहिए ? गौतम ! उसे कदाचित् प्राण कहना चाहिए, कदाचित् भूत कहना चाहिए, कदाचित् जीव कहना चाहिए, कदाचित् सत्य कहना चाहिए, कदाचित् विज्ञ कहना चाहिए, कदाचित् वेद कहना चाहिए, कदाचित् प्राण, भूत, जीव, सत्त्व, विज्ञ और वेद कहना चाहिए। हे भगवन् ! उसे प्राण कहना चाहिए, यावत्- वेद कहना चाहिए, इसका क्या कारण है ? गौतम ! पूर्वोक्त निर्ग्रन्थ का जीव, बाह्य और आभ्यन्तर उच्छ्वास तथा निःश्वास लेता और छोड़ता है, इसलिए उसे प्राण कहना चाहिए । वह भूतकाल में था, वर्तमान में है और भविष्यकाल में रहेगा इसलिए उसे भूत कहना चाहिए । तथा वह जीव होने से जीता है, जीवत्व एवं आयुष्यकर्म का अनुभव करता है, इसलिए उसे जीव कहना चाहिए । वह शुभ और अशुभ कर्मों से सम्बद्ध है, इसलिए उसे सत्त्व कहना चाहिए । वह तिक्त, (तीखा) कटु, कषाय, खट्टा, मीठा, इन रसों का ज्ञाता है, इसलिए विज्ञ कहना चाहिए, तथा वह सुख-दुःख का वेदन करता है, इसलिए वेद कहना चाहिए। सूत्र-१११ भगवन् ! जिसने संसार का निरोध किया है, जिसने संसार के प्रपंच का निरोध किया है, यावत् जिसने अपना कार्य सिद्ध कर लिया है, ऐसा प्रासुकभोजी अनगार क्या फिर मनुष्यभव आदि भवों को प्राप्त नहीं होता ? हाँ, गौतम ! पूर्वोक्त स्वरूप वाला निर्ग्रन्थ अनगार फिर मनुष्यभव आदि भवों को प्राप्त नहीं होता। हे भगवन् ! पूर्वोक्त स्वरूपवाले निर्ग्रन्थ के जीव को किस शब्द से कहना चाहिए ? हे गौतम ! पूर्वोक्त स्वरूप वाले निर्ग्रन्थ को सिद्ध कहा जा सकता है, बुद्ध कहा जा सकता है, मुक्त कहा जा सकता है, पारगत कहा जा सकता है, परम्परागत कहा जा सकता है । उसे सिद्ध, बुद्ध, मुक्त, परिनिर्वृत, अन्तकृत् एवं सर्वदुःख-प्रहीण कहा जा सकता है । हे भगवन् ! यह इसी प्रकार है, भगवन् ! यह इसी प्रकार है; यों कहकर भगवान गौतमस्वामी श्रमण भगवान महावीर को वन्दना-नमस्कार करते हैं और फिर संयम और तप से अपनी आत्मा को भावित करके विचरण करते हैं । उस काल और उस समय में (एकदा) श्रमण भगवान महावीरस्वामी राजगृह नगर के गुणशील चैत्य से नीकले और बाहर जनपदों में विहार करने लगे। सूत्र-११२ उस काल उस समय में कृतंगला नामकी नगरी थी । उस कृतंगला नगरी के बाहर ईशानकोण में छत्रपलाशक नामका चैत्य था । वहाँ किसी समय उत्पन्न हुए केवलज्ञान-केवलदर्शन के धारक श्रमण भगवान महावीर स्वामी पधारे । यावत्-भगवान का समवसरण हुआ । परीषद्धर्मोपदेश सूनने के लिए नीकली। उस कृतंगला नगरी के निकट श्रावस्ती नगरी थी । उस श्रावस्ती नगरी में गर्दभाल नामक परिव्राजक का मुनि दीपरत्नसागर कृत् "(भगवती) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 39
SR No.034671
Book TitleAgam 05 Bhagwati Sutra Part 01 Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages250
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 05, & agam_bhagwati
File Size6 MB
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