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________________ आगम सूत्र ५, अंगसूत्र- ५, 'भगवती / व्याख्याप्रज्ञप्ति-1 ' शतक/ शतकशतक / उद्देशक / सूत्रांक आम्रवन, तिलकवृक्षों का वन, तूम्बे की लताओं का वन, वटवृक्षों का वन, छत्रौधवन, अशनवृक्षों का वन, सन (पटसन) वृक्षों का वन, अलसी के पौधों का वन, कुसुम्बवृक्षों का वन, सफेद सरसों का वन, दुपहरिया वृक्षों का वन, इत्यादि वन से अतीव अतीव उपशोभित होता है; इसी प्रकार वाणव्यन्तर देवों के देवलोक जघन्य दस हजार वर्ष की तथा उत्कृष्ट एक पल्योपम की स्थिति वाले एवं बहुत-से वाणव्यन्तरदेवों से और उनकी देवियों से आकीर्ण, व्याकीर्ण- एकदूसरे पर आच्छादित, परस्पर मिले हुए, स्फुट प्रकाश वाले, अत्यन्त अवगाढ़ श्री शोभासे अतीव-अतीव सुशोभित रहते हैं । हे गौतम । उन वाणव्यन्तर देवों के देवलोक इसी प्रकार के हैं। इस कारण से ऐसा कहा जाता है कि असंयत जीव मरकर यावत् कोई देव होता है और कोई देव नहीं होता । हे भगवन् यह इसी प्रकार को वन्दना करते हैं, नमस्कार करते हैं; विचरण करते हैं । है " यह इसी प्रकार है. ऐसा कहकर भगवान गौतम श्रमण भगवान महावीर वन्दना - नमस्कार कर के संयम तथा तप से आत्मा को भावित करते हुए शतक- १ उद्देशक- २ - सूत्र - २६ राजगृह नगर (भगवान का) समवसरण हुआ। परीषद् नीकली । यावत् (श्री गौतमस्वामी) इस प्रकार बोलेभगवन् ! क्या जीव स्वयंकृत दुःख (कर्म) को भोगता है ? गौतम ! किसी को भोगता है, किसी को नहीं भोगता। भगवन् ! किस कारण से आप ऐसा कहते हैं ? गौतम ! उदीर्ण दुःख को भोगता है, अनुदीर्ण दुःख-कर्म को नहीं भोगता; इसीलिए कहा गया है कि किसी कर्म को भोगता है और किसी कर्म को नहीं भोगता । भगवन् ! क्या (बहुत-से) जीव स्वयंकृत दुःख भोगते हैं ? गौतम ! किसी कर्म (दुःख) को भोगते हैं, किसी को नहीं भोगते । भगवन् ! इसका क्या कारण है ? गौतम ! उदीर्ण (कर्म) को भोगते हैं, अनुदीर्ण को नहीं भोगते । इस कारण ऐसा कहा गया है कि किसी कर्म को भोगते हैं, किसी को नहीं भोगते। इसी प्रकार यावत् नैरयिक से लेकर वैमानिक तक चौबीस दण्डकों के सम्बन्ध में प्रश्नोत्तर समझ लेना चाहिए। भगवन् ! क्या जीव स्वयंकृत आयु को भोगता है ? हे गौतम! किसी को भोगता है, किसी को नहीं भोगता । जैसे दुःख-कर्म के विषय में दो दण्डक कहे गए हैं. उसी प्रकार आयुष्य (कर्म) के सम्बन्ध में भी एकवचन और बहुवचन वाले दो दण्डक कहने चाहिए। एकवचन से यावत् वैमानिकों तक कहना, बहुवचन से भी (वैमानिकों तक) कहना । सूत्र - २७ , भगवन्! क्या सभी नारक समान आहार वाले, समान शरीर वाले तथा समान उच्छ्वास निःश्वास वाले होते हैं ? गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है । भगवन् ! ऐसा किस कारण से कहते हैं ? गौतम ! नैरयिक जीव दो प्रकार के कहे गए हैं; जैसे कि महाशरीरी और अल्पशरीरी। इनमें जो बड़े शरीर वाले हैं, वे बहुत पुद्गलों का आहार करते हैं, बहुत पुद्गलों का परिणमन करते हैं, बहुत पुद्गलों को उच्छ्वास रूप में ग्रहण करते हैं और बहुत पुद्गलों को निःश्वासरूप से छोड़ते हैं तथा वे बार-बार आहार लेते हैं, बार-बार उसे परिणमाते हैं, तथा बारबार उच्छ्वास-निःश्वास लेते हैं । तथा जो छोटे शरीर वाले नारक हैं, नारक हैं, वे थोड़े पुद्गलों का आहार करते हैं, थोड़े-से पुद्गलों का परिणमन करते हैं, और थोड़े पुद्गलों को उच्छ्वास रूप से ग्रहण करते हैं, तथा थोड़े-से पुद्गलों को निःश्वास-रूप से छोड़ते हैं। वे कदाचित् आहार करते हैं, कदाचित् उसे परिणमाते हैं और कदाचित् उच्छ्वास तथा निःश्वास लेते हैं। हे गौतम! इस हेतु से ऐसा कहा जाता है कि सभी नारक जीव समान आहार वाले, समान शरीर वाले और समान उच्छ्वास निःश्वास वाले नहीं हैं। ! भगवन् ! क्या सभी नारक समान कर्म वाले हैं ? गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है। भगवन् ! ऐसा किस कारण से कहते हैं ? गौतम नारकी जीव दो प्रकार के कहे गए हैं: वह इस प्रकार हैं- पहले उत्पन्न हुए और पीछे उत्पन्न हुए। इनमें से जो पूर्वोपपन्नक हैं वे अल्पकर्म वाले हैं और उनमें जो पश्चादुपपन्नक हैं, वे महाकर्म वाले हैं, इस कारण से हे गीतम। ऐसा कहा जाता है कि सभी नारक समान कर्म वाले नहीं हैं। मुनि दीपरत्नसागर कृत् " ( भगवती )" आगमसूत्र - हिन्द-अनुवाद” Page 12
SR No.034671
Book TitleAgam 05 Bhagwati Sutra Part 01 Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages250
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 05, & agam_bhagwati
File Size6 MB
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