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________________ आगम सूत्र १, अंगसूत्र-१, 'आचार' श्रुतस्कन्ध/चूलिका/अध्ययन/उद्देश/सूत्रांक पूछे- आयुष्मन् श्रमण ! यहाँ से ग्राम यावत् राजधानी कितनी दूर हैं ? तथा यहाँ से ग्राम यावत् राजधानी का मार्ग अब कितना शेष रहा है?' साधु इन प्रश्नों के उत्तर में कुछ भी न कहे, न ही कुछ बताए, वह उनकी बात को स्वीकार न करे, बल्कि मौन धारण करके रहे। और फिर यतनापूर्वक ग्रामानुग्राम विहार करे। सूत्र - ४६४ ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए साधु या साध्वी को मार्ग में मदोन्मत्त साँड़, विषैला साँप, यावत् चित्ते, आदि हिंसक पशुओं को सम्मुख-पथ से आते देखकर उनसे भयभीत होकर उन्मार्ग से नहीं जाना चाहिए, और न ही एक मार्ग से दूसरे मार्ग पर संक्रमण करना चाहिए, न तो गहन वन एवं दुर्गम स्थान में प्रवेश करना चाहिए, न ही वृक्ष पर चढ़ना चाहिए और न ही उसे गहरे और विस्तृत जल में प्रवेश करना चाहिए । वह ऐसे अवसर पर सुरक्षा के लिए किसी बाड़ की शरण की, सेना की या शस्त्र की आकांक्षा न करे; अपितु शरीर और उपकरणों के प्रति राग-द्वेष रहित होकर काया का व्युत्सर्ग करे, आत्मैकत्वभाव में लीन हो जाए और समाधिभाव में स्थिर रहे । तत्पश्चात् यतनापूर्वक ग्रामानुग्राम विचरण करे। ग्रामानुग्राम विहार करते हुए साधु-साध्वी जाने कि मार्ग में अनेक दिनों में पार करने योग्य अटवी-मार्ग है। यदि उस अनेक दिनों में पार करने योग्य अटवी-मार्ग के विषय में वह यह जाने कि इस अटवी-मार्ग में अनेक चोर (लूटेरे) इकट्ठे होकर साधु के उपकरण छीनने की दृष्टि से आ जाते हैं, यदि सचमुच उस अटवीमार्ग में वे चोर इकटे होकर आ जाएं तो साधु उनसे भयभीत होकर उन्मार्ग में न जाए, न एक मार्ग से दूसरे मार्ग पर संक्रमण करे, यावत् समाधि भाव में स्थिर रहे । तत्पश्चात् यतनापूर्वक ग्रामानुग्राम विचरण करे। सूत्र-४६५ ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए साधु के पास यदि मार्ग में चोर संगठित होकर आ जाएं और वे कहें कि ये वस्त्र, पात्र, कम्बल और पादपोंछन आदि लाओ, हमें दे दो, या यहाँ पर रख दो। इस प्रकार कहने पर साधु उन्हें वे न दे, और न नीकाल कर भूमि पर रखे । अगर वे बलपूर्वक लेने लगे तो उन्हें पुनः लेने के लिए उनकी स्तुति करके हाथ जोड़कर या दीन-वचन कहकर याचना न करे । यदि माँगना हो तो उन्हें धर्म-वचन कहकर-समझाकर माँगे, अथवा मौनभाव धारण करके उपेक्षाभाव से रहे। यदि वे चोर साधु को गाली-गलौच करें, अपशब्द कहें, मारे-पीटे, हैरान करे, यहाँ तक कि उसका वध करने का प्रयत्न करे और उसके वस्त्रादि को फाड़ डाले, तोड़फोड़ कर दूर फेंक दें, तो भी वह साधु ग्राम में जाकर लोगों से उस बात को न कहे, न ही फरियाद करे, न ही किसी गृहस्थ के पास जाकर कहे कि चोरों ने हमारे उपकरण छीनने के लिए अथवा हमें कोसा है, मारा-पीटा है, हमें हैरान किया है, हमारे उपकरणादि नष्ट करके दूर फेंक दिए हैं । ऐसे कुविचारों को साधु मन में भी न लाए और न वचन से व्यक्त करे । किन्तु निर्भय, निर्द्वन्द्व और अनासक्त होकर आत्मभाव में लीन होकर शरीर और उपकरणों का व्युत्सर्ग कर दे और राग-द्वेष रहित होकर समाधिभाव में विचरण करे। यही उस साधु या साध्वी के भिक्षु जीवन की समग्रता है कि वह सभी अर्थों में सम्यक् प्रवृत्तियुक्त होकर संयम पालन में सदा प्रयत्नशील रहे।-ऐसा मैं कहता हूँ। अध्ययन-३ का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण मुनि दीपरत्नसागर कृत् “(आचार) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 86
SR No.034667
Book TitleAgam 01 Acharang Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages126
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 01, & agam_acharang
File Size4 MB
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