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________________ चतुर्थी विभक्ति ( सम्प्रदान) तृतीया विभक्ति ने अपना वक्तव्य समाप्त किया तो चतुर्थी विभक्ति प्रभु के चरणों में उपस्थित हुई। उसने विनय के साथ वन्दना की और अपनी विशेषताएँ कहनी शुरू की। . ___भगवन् ! कर्ता, कर्म करण की क्या महत्ता है ? मेरे बिना तो ये अकेले कुछ भी नहीं कर सकते । प्रत्येक क्रिया में मैं सहायक होती हूँ, तभी कार्य सिद्धि होती है । सम्प्रदान मेरा नाम है। आप जानते ही हैं कि सम्प्रदान की मानव-संसार में कितनी बड़ी प्रतिष्ठा है। सम्प्रदान के द्वारा ही संसार में परोपकार होता है । सम्प्रदान के द्वारा ही आत्मा अपना कल्याण कर सकती है। मेरे प्रत्यय बड़े ही मनोहर हैं। ये Pun २६ उभ्यांभ्यस् ॥ १।। १३५ ॥ देयैराप्ये प्रधानेऽर्थे वर्तमानादेकद्विबहुषु यथासंख्यं भ्याम् भ्यस् प्रत्यया भवन्ति । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034656
Book TitleVibhakti Samvad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj
PublisherLala Sitaram Jain
Publication Year1941
Total Pages100
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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