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________________ २० विभक्ति संवाद 23 काल में वर्तमान नक्षत्रवाची शब्द से भी आधार में तृतीया विभक्ति विकल्प से हो जाती है । ૧૪ अस्मृति में वर्तमान सम् उपसर्गपूर्वक जानाति धातु के कर्म में भी विकल्प से तृतीया विभक्ति होती है । जिस अक्षि तथा पाद आदि अर्थों के काणत्व, खंजत्व आदि प्रकारों से, विशेषों से, देवदत्त आदि की आख्या बने, उसमें भी तृतीया विभक्ति होती है । दीनबन्धो ! आपके समक्ष कुछ भी असत्य कहना पाप है । अतः मैंने सत्यरूप से अपनी जो भी विशेषताएँ थीं, आपकी सेवा में प्रगट कर दी हैं । मेरा क्षेत्र बहुत विशाल है । संसार में जितनी भी क्रियाएँ हैं, सब में मेरा उपयोग होता है । अतः सर्व प्रथम मेरे ही सम्बन्ध में वर्णन करने को कृपा करें । २३ काले भाद्वाधारे १।३।१३१ । काले वर्तमानान्नक्षत्रवाचिनः शब्दादाधारे टाभ्यांभिसो वा भवन्ति । पुष्येण पायसमश्नीयात् पुष्ये पायसमश्नीयात् । , २४ समो ज्ञोऽस्मृतौ चाप्ये ॥ १ । ३ । १३३ ॥ संपूर्वस्य जानातेरस्मृतौ वर्तमानस्य यदाप्यं प्राप्यं कर्म तत्राभ्याम् भिसो वा भवन्ति । मात्रा संजानीते, मातरं संजानीते । अस्मृताविति किम् ? मातरं संजानाति, मातुः संजानाति । स्मरतीत्यर्थः । २५ यद्भेदैस्तद्वदाख्या ॥ १ । ३ । १३० ॥ यस्य भेदिनः प्रकारवतोऽर्थस्य मेदैः प्रकारैः विशिष्टैः तद्वतः तत्प्रकारवदर्थकस्य आख्या भवति । ततः टा भ्याम् भिसो भवन्ति । अक्ष्णा काणः । पादेन खजः । प्रकृत्या दर्शनीयः । जात्या ब्राह्मणः । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034656
Book TitleVibhakti Samvad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj
PublisherLala Sitaram Jain
Publication Year1941
Total Pages100
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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