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________________ १० विभक्ति संवाद वह किसी भी क्रिया में सफलता नहीं प्राप्त कर सकता । मेरा प्रभुत्व तो कर्ता को भी मानना पड़ता है । 1 संसार की जो कुछ भी यह रचना नज़र आ रही है, सब मेरी ही है । मेरा अस्तित्व प्रत्येक चैतन्य पर प्रतिबिम्बित हो रहा है । भगवन् ! आपका यह विश्वविमोहन ऐश्वर्य और परोपकार भी तो मेरे ही द्वारा है । यह सब कुछ वैभव नाम-कर्म की शुभ प्रकृतियों के उदय से है और कर्म का अधिष्ठातृत्व, आप जानते ही हैं, मुझे ही मिला हुआ है । कर्म के बोधक तीन प्रत्यय हैं— 'अम्, औट और शस् ।' ये तीनों प्रत्यय मुझ में ही लगते हैं । संस्कृत आदि भाषाओं में उक्त तीनों वचनों का कितना महान् गौरव है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है । मेरे रूप भी कितने सुन्दर तथा भावपूर्ण हैं- धर्मम्, धर्मों, धर्मान् । उक्त तीनों रूप कर्ता को शिक्षा देते हैं कि - हे कर्त: ! यदि तू सुखी बनना चाहता है तो दर्शन, ज्ञान और चारित्र रूप त्रिविध धर्म का सम्यक्तया आचरण कर । अन्यथा तू संसार अटवी से किसी तरह भी पार न हो सकेगा । भगवन् ! मेरा क्षेत्र बहुत विशाल है । हा धिक्, समया, " ८ कर्मणि ॥ १।३ । १०५ ॥ " क्रियते इति कर्म तन्निर्वर्त्य विकार्यं प्राप्यं तस्मिन्नप्रधानेऽर्थे वर्तमानादमौट्शसो भवन्ति । ९ हा धिक समया - निकषोपर्यपर्यध्यध्यधोऽधोऽत्यन्तरान्तरेण तस्पर्यभिसर्वोमयैश्वाप्रधानेऽमशस् ॥ १।३ । १०० ॥ हाधिगादिभिस्तसन्तैश्च पर्यादिभिरव्ययैर्योगेऽप्रधानेऽर्थे वर्तमानादेक Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034656
Book TitleVibhakti Samvad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj
PublisherLala Sitaram Jain
Publication Year1941
Total Pages100
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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