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________________ द्वितीया विभक्ति ( कर्म ) प्रथमा विभक्ति जब अपना वक्तव्य समाप्त कर चुकी और अपनी श्रेष्ठता बता चुकी, तब द्वितीया विभक्ति ने प्रभु के चरणों में अपना निवेदन करना आरंभ किया । I भगवन् ! मैं द्वितीया विभक्ति हूँ । मेरा गौरव किसी भी 'प्रकार कम नहीं । कर्म की अधिष्ठात्री मैं हूँ। कर्ता मेरे ही अधीन रहता है । मैंने कर्ता को आबद्ध किया हुआ है । यदि मैं कर्ता के समीप न रहूँ तो कर्ता सर्वथा अवीर्य' हो जाता है । क्रिया की अपेक्षा से ही कर्ता सवीर्य है । I नाथ ! प्रथमा विभक्ति ने जो अपने कर्तृत्व का गुणगान किया है, वह सब व्यर्थ है । मेरे बिना तो कर्ता शून्यवत् है । ७ जे ते सेलेसी पडिवण्णया ते णं हडिवीरिएणं सीरिया, करणवीरिपूर्ण अजीरिया । भग० श० १४० ८ । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034656
Book TitleVibhakti Samvad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj
PublisherLala Sitaram Jain
Publication Year1941
Total Pages100
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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