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________________ ६८ सिद्धान्तकल्पवल्ली [ प्रतिबिम्बमें सत्यत्वमिध्यात्ववाद ल मूलाज्ञानं हेतुर्बिम्बासंनिहितमुकुरधीर्बाधः । बिम्बादिदोषजत्वात् प्रातीतिकता च घटत इत्येके ॥२०॥ क्षेण तदज्ञानस्याऽऽवरणांशनाशेऽपि बिम्बसन्निधानादिप्रतिबन्धाद्विक्षेपांशेन नाशाभावात् तादृशमेवाऽज्ञानं प्रतिबिम्बोपादानमिति परिहरति-नन्विति ॥ १९ ॥ न तावद् विक्षेपशक्तिमदवस्थाज्ञानं प्रतिबिम्बोपादानम् । यत्र पूर्वमेव दर्पणप्रत्यक्ष पश्चात् बिम्बसंनिधौ तत्र प्रतिबन्धकामावाद्विक्षेपांशस्य नाशे प्रतिबिम्बानुदयप्रसप्रात् । किन्तु विक्षेपशक्तिमन्मूलाज्ञानमेव तदुपादानम् । न च तत्राऽपि तुल्यो दोषः, पराविषयवृत्तीनां स्वस्वविषयावच्छिन्न चैतन्यप्रदेशे मूलाज्ञानावरणशक्त्यंशाभिभावकत्वेऽपि तदीयविक्षेपानिवर्तकत्वस्य व्यावहारिकघटादिविक्षेपानिवृत्त्या क्लसत्वादिति मतान्तरमाह-मूलेति । ननु तर्हि बिम्बापसरणेऽपि यावद् ब्रह्मज्ञानोदयं प्रतिबिम्बानुवृत्तिः स्यात, उपादानाज्ञानसत्त्वादित्याशयाऽऽह-बिम्बासंनिहितमुकुरदर्पणके प्रत्यक्षसे अधिष्ठानके अज्ञानके आवरणांशका नाश होनेपर भी बिम्बसन्निधान आदि प्रतिबन्धकोंके कारण उसके विक्षेपांशका नाश नहीं होता; अतः विक्षेपशक्तिसे युक्त अज्ञानके प्रतिबिम्बोपादान होनेसे ही अध्यास उपपन्न है ॥ १९॥ पूर्वोक्त समाधानमें अनुपपत्ति बतलाकर अन्य समाधान कहते हैं'मूलाज्ञानम्' इत्यादिसे। विक्षेपशक्तिवाला अवस्थाज्ञान प्रतिबिम्बका उपादान हो नहीं सकता, क्योंकि जहाँ पहले ही दर्पणका प्रत्यक्ष हुआ पीछे बिम्बकी सन्निधि हुई वहाँ प्रतिबन्धकके न होनेसे विक्षेपांशका नाश हो जानेपर प्रतिबिम्बका उदय नहीं होगा; किन्तु विक्षेपशक्तिवाला मूलाज्ञान ही प्रतिबिम्बका उपादान होता है । यदि यों कहे कि इस पक्षमें भी तो दोष तुल्य है; तो उसपर कहते हैं-पराग विषयक जो वृत्तियाँ हैं, उनमें अपने-अपने विषयावच्छिन्न चैतन्यप्रदेशमें मूला. ज्ञानके आवरणशक्त्यंशका अभिभावकत्व होनेपर भी व्यावहारिक घटादिविक्षेपकी निवृत्ति न होनेसे उन वृत्तियोंमें मूलाज्ञानके विक्षेपांशके अनि. वर्तकत्वकी कल्पना की जाती है, अतः प्रतिबिम्बाध्यासमें मूलाज्ञान ही हेतु है । यहाँ शंका होती है कि यदि मूलाज्ञानको हेतु मानोगे, तो मूलाज्ञानकी निवृत्ति ब्रह्मज्ञानके बिना होती नहीं, इसलिए बिम्बको हटा लेनेपर भी जबतक ब्रह्मज्ञानका उदय नहीं होगा तबतक प्रतिबिम्बकी अनुवृत्ति रहेगी, निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि उपादानभूत अज्ञान है ही। इस शङ्काका समाधान करते हैं-बिम्बके असंनिधानसे सहकृत Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034618
Book TitleSiddhant Kalpvalli
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSadashivendra Saraswati
PublisherAchyut Granthmala
Publication Year1941
Total Pages136
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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