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________________ प्रथम स्तवक] भाषानुवादसहिता वियदादावीशोऽन्तःकरणमुखे द्वौ तु जीवेशौ । योनिरिति संगिरन्ते मायाविद्याभिदाविदः केचित् ॥ १९ ॥ अन्तःकरणप्रभृतेः स्वाविद्यामात्रपरिणतत्वेन । स्याजीव एव योनिस्तत्रेति तदेकदेशिनः प्राहुः ॥२०॥ सर्ववित् ईश्वर एवोपादानमिति मतान्तरमाह-विवरणेति । तथा च संक्षेपशारीरकग्रन्थोऽपि विशिष्टनिरासपरत्वेनाऽनुकूलो व्याख्यातुं शक्य इति भावः ॥ १८ ॥ 'एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति' इति कलाशब्दवाच्यप्राणान्तःकरणादीनां विदुषः प्रायणे जीवाश्रिताविद्याकार्यभूतसूक्ष्मपरिणामत्वाभिप्रायेण विद्ययोच्छेद उक्तः, 'गताः कलाः पञ्चदशप्रतिष्ठाः' इति श्रुत्यन्तरे ईश्वराश्रितमायाकार्यमहाभूतपरिणामत्वाभिप्रायेण प्रतिष्ठाशब्दितमहाभूतेषु लयोक्तेश्च अन्तःकरणादौ जीवेशावुभावप्युपादानम् , वियदादी स्वीश्वर एवेति मायाविद्याभेदवादिषु केषांचिन्मतमाह-वियदिति ॥१९॥ ___यथा वियदादेः ईश्वराश्रितमायापरिणामत्वेन तत्रेश्वर एवोपादानम् , तथा सर्ववित्' (जो सर्वज्ञ और सर्वविद्--सर्वानुभू-है) इस श्रुतिवचनके आधारपर सर्वज्ञत्वादिविशिष्ट मायासे उपहित जो सर्वज्ञ ईश्वर है, वही उपादानकारण है, ऐसा कहते हैं, इस मतसे संक्षेपशारीरक ग्रन्थका भी विशिष्टके निरासमें तात्पर्य मानकर अनुकूल व्याख्यान हो सकता है ॥ १८ ॥ __ इसी विषयमें माया और अविद्याको भिन्न माननेवालेका मत दिखलाते हैं'वियदा.' इत्यादिसे। ... 'एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति' (ऐसे ही इस परिद्रष्टाकी सोलह कलाएँ, जो पुरुषका आश्रय करती हैं, पुरुषको प्राप्त होकर अस्तको प्राप्त हो जाती हैं) इस श्रुतिमें विद्वान् के अवसानकालमें कलाशब्दवाच्य प्राण, अन्तःकरण आदिका जो विद्यासे उच्छेद कहा गया है, वह जीवाश्रित अविद्या के कार्य भूतसूक्ष्मके अन्तःकरण आदि परिणाम हैं, ऐसा मानकर कहा गया है और 'गताः कलाः पञ्चदशप्रतिष्ठाः' इस दूसरी श्रुतिमें उन्हें ईश्वराश्रित मायाके कार्य महाभूतके परिणाम मानकर सब कलाओंका प्रतिष्ठाशब्दित महाभूतोंमें लय कहा गया है, इससे अन्तःकरणादिमें जीव और ईश्वर दोनों उपादान हैं और आकाशादिमें केवल ईश्वर ही उपादान है; ऐसा माया और अविद्याका भेद माननेवाले कई एक आचार्योंका मत है ॥ १९ ।। जैसे आकाश आदि ईश्वराश्रित मायाके परिणाम हैं, अतः उनका उपादान Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034618
Book TitleSiddhant Kalpvalli
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSadashivendra Saraswati
PublisherAchyut Granthmala
Publication Year1941
Total Pages136
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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