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सिद्धान्तकल्पवल्ली
विधिवाद]
भवतु मन एव साक्षात्कारे करणं तथापि तत्रैव । सहकारितया श्रवणं नियम्यते न तु परोक्ष इत्येके ॥ १० ॥ संक्षेपाचार्यास्तु श्रवणं न ज्ञानफलकमेवं च । पुरुषापराधशान्त्यै नियम्यते श्रवणमित्याहुः ॥ ११ ॥
wwwwwwwwwxx अन्तु नाम साक्षात्कारे मन एव करणम् , तथापि प्रकाशमाने वस्तुन्यारोपिताविवेकनिवारकशास्त्रसद्भावे तच्छ्रवणं तत्साक्षात्कारकरणसहकारीति नियमस्य श्रेत्रसहकारिणि षड्जाद्यविवेकनिरासके गान्धर्वशास्त्रे क्लप्तत्वात् । 'द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इति दर्शनमुद्दिश्य श्रवणविधानात्तत्रैव साक्षात्कारकरणीभूतमनःसहकारितया श्रवणं नियम्यत इति मतान्तरमाह-भवतु मन एवेति ॥ १० ॥
श्रवणं नाम न विचारितवेदान्तशब्दज्ञानरूपम् , ज्ञानस्याऽविधेयत्वात् ; किन्तु ऊहापोहात्मकमानसक्रियारूपम् । तच्च न परोक्षादिज्ञानफलकम् , ज्ञानस्य प्रमाणफलत्वात् । एवं च तात्पर्यनिर्णयद्वारा तात्पर्यभ्रमरूपपुरुषापराधशान्त्यर्थत्वेन श्रवणं नियम्यत इति मतान्तरमाह-संक्षेपाचार्यास्त्विति । पुरुषापराधनिरासः
'भवतु' इत्यादि । साक्षात्कार में भले ही केवल मन करण हो, परन्तु प्रकाशमान वस्तुमें आरोपित अविवेकका निवारण करनेवाला शास्त्र जहां विद्यमान है, वहां उस शास्त्रका श्रवण उस वस्तुके साक्षात्कारकरणका सहकारी होता है, ऐसा नियम, श्रोत्रेन्द्रियके सहकारी षड्ज आदि स्वरोंके अविवेकका निरास करनेवाले सङ्गीतशास्त्रमें पाया जाता है । 'द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' यहांपर भी दर्शनका उद्देश करके श्रवणका विधान है, अतः उसीमें साक्षात्कार के करणरूप मनके सहकारी-भावसे श्रवणका नियमन किया जाता है; परोक्षमें नहीं; ऐसा कई एकका मत है ॥ १० ॥ ___ यहां श्रवणपदका केवल विचारित वेदान्तशब्दोंका ज्ञान ही अर्थ नहीं समझना चाहिए, क्योंकि ज्ञान विधेय नहीं हो सकता; किन्तु ऊहापोहरूपमानस क्रियाका उसका परोक्षादि ज्ञान फल नहीं है। ज्ञान तो प्रमाणफल है; अतः तात्पर्यभ्रमरूप पुरुषके दोषकी शान्तिके लिए यहां श्रवणका नियमन किया गया है, ऐसा मतान्तर कहते हैं—'संक्षेपा०' इत्यादिसे । ___ सङ्क्षपशारीरक महानिबन्धके प्रणेता भगवान् सर्वज्ञमहामुनि यहाँ विधिका स्वरूप ऐसा बतलाते हैं-केवल ज्ञान ही श्रवणका फल नहीं है, किन्तु जहाँ तात्पर्यभ्रमरूप पुरुषदोष होता है, वहाँ तात्पर्यका निर्णय दर्शाकर उस पुरुषापराधकी निवृत्ति करानेमें श्रवणका नियमसे उपयोग है अर्थात्-श्रवणका फल पुरुषदोष
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