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________________ तृतीय स्तबक ] भाषानुवादसहिता wwwwwwww w ww ८. शाब्दापरोक्षवादः साक्षात्कारं जनयेत् प्रत्ययसन्तानसहकृतं वाक्यम् । अग्निविशेषोपेतो होम इवाऽपूर्वमित्यपरे ॥ १७ ॥ ध्यानाभ्याससहायान्मनसो नष्टेष्टवस्तुविषयेव । साक्षात्कृतिरिह युक्ता वाक्याब्रह्मावलम्बिनीत्यपरे ॥ १८ ॥ उपनिषदेकवेद्यत्वस्य प्रतिपादनाच्च ब्रह्मसाक्षात्कारे महावाक्यमेव करणम् , न तु मनः, 'यन्मनसा न मनुते' इत्यादितत्करणत्वप्रतिषेधश्रवणादिति मतान्तरमाहइतरे विति । 'मनसैवाऽनुद्रष्टव्यम्' इत्यादिश्रुतिस्तु साक्षात्कारे हेतुत्वमात्रपरा, न तु कारणत्वपरा, तावतैव मनसेति तृतीयाया उपपत्तेरिति भावः ॥ १६ ॥ ननु वाक्यस्य परोक्षज्ञानजनकत्वक्लप्तेः कथमपरोक्षज्ञानजनकत्वमित्याशङ्कय स्वतः परोक्षज्ञानजननसमर्थमपि वाक्यं वैधाग्न्यधिकरणसहकृतो होमोऽपूर्वमिव विहितभावनापचयसहकृतं सत् अपरोक्षज्ञानमपि जनयतीति मतान्तरमाहसाक्षात्कारमिति । औपनिषदे ब्रह्मणि मानान्तराप्रवृत्तेः परोक्षज्ञानेनाऽपरोक्षभ्रमनिवृत्त्ययोगाच्छब्दादपरोक्षज्ञानानुदयेऽनिर्मोक्षप्रसङ्ग इति भावः ॥ १७ ॥ ब्रह्मसाक्षात्कारमें महावाक्य ही करण हैं, मन नहीं, यह निश्चय होता है। क्योंकि 'यन्मनसा न मनुते' (जो मनसे मत नहीं होता) इत्यादि मनकी करणताका प्रतिषेध करनेवाला वचन है । और 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' इत्यादि श्रुति तो साक्षात्कारमें मनका हेतुत्वमात्र कहती है, असाधारण कारणत्व नहीं कहती। क्योंकि, उतना कहनेसे तृतीयाकी उपपत्ति हो जाती है ॥ १६ ॥ 'साक्षात्कारम्' इत्यादि । वाक्य तो परोक्षज्ञानका जनक माना जाता है, अतः उसमें अपरोक्ष बोधकी जनकता कैसे होगी, ऐसी आशङ्का करके समाधान करते हैं कि वाक्य यद्यपि स्वतः परोक्षज्ञानके जननमें समर्थ हैं; तथापि विधिविहित अनिरूप अधिकरणसे सहकृत होम जैसे अपूर्वको उत्पन्न करता है; वैसे ही प्रत्ययसन्तानरूप (विहितभावनाप्रचय) सहकारीके मिलनेसे वाक्य अपरोक्ष ज्ञानको भी उत्पन्न करता है, ऐसा अपर मानते हैं। उपनिषद्वेद्य ब्रह्ममें प्रमाणान्तरकी तो प्रवृत्ति है ही नहीं और परोक्ष ज्ञानसे अपरोक्ष भ्रमकी निवृत्ति हो नहीं सकती, अतः यदि शब्दसे अपरोक्ष ज्ञानका उदय नहीं होगा, तो अनिर्मोक्षका प्रसङ्ग हो जायगा, इसलिए शब्दको अपरोक्ष बोधका जनक मानते हैं ॥ १७ ॥ 'ध्यानाभ्यास.' इत्यादि । मन बाहरके अर्थमें असमर्थ होनेपर भी भावना Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034618
Book TitleSiddhant Kalpvalli
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSadashivendra Saraswati
PublisherAchyut Granthmala
Publication Year1941
Total Pages136
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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