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________________ ७८ सिद्धान्तकल्पवल्ली [ मिथ्यात्वके मिथ्या होनेपर भी प्रपञ्चमिथ्यात्व ८.मिथ्यात्वस्य मिथ्यात्वेऽपिन प्रपञ्चमिथ्यात्वहानिरितिवादः मिथ्यात्वं यदि मिथ्या जगतः सत्यत्वमापतेत्तर्हि । सत्यं चेदद्वैतक्षतिरत्राऽद्वैतदीपिकाकाराः ॥ ४१ ॥ स्वाश्रयसमसत्ताको धर्मः स्वविरुद्धधर्महरः । इति नियमान्मिथ्यात्वं सत्यत्वनिवृत्तिहेतुरित्याहुः ॥ ४२ ॥ wwwwwwwww. नादिजननादर्थक्रिया च काचिदस्त्येव । तथापि कचिद्दोषसामान्यज्ञानाध्यासहेतूच्छेदोपरमात् कचिद्विशेषदर्शनादधिष्ठानज्ञानेन बाधान्न सर्वार्थक्रियेति मतान्तरमाहअस्त्येवेति ॥ ४०॥ तदेवं मिथ्यात्वेऽपि अर्थक्रियासिद्धयविरोधाज्जगतो मिथ्यात्वं सिद्धम् । तत्र माध्वः शङ्कते-मिथ्यात्वमिति । अत्रेत्यादेहत्तरेणाऽन्वयः ॥ ४१ ॥ ___ सर्वत्र धर्माणां स्वविरोधिपतिक्षेपकत्वे धर्मिसमसत्ताकत्वमेव तन्त्रम् , न पारमार्थिकत्वमपि; व्यावहारिकेणाऽपि घटत्वेनाऽघटत्वादिप्रतिक्षेपदर्शनात् । अतो जगत्समसत्ताकेनाऽपि मिथ्यात्वेन सत्यत्वप्रतिक्षेपसिद्धिरित्याशयेन परिहरतिस्वाश्रयेति । स्वविरुद्धधर्महरः स्वविरुद्धधर्मप्रतिक्षेपक इत्यर्थः । सत्यत्वनिवृत्तिहेतुः सत्यत्वपतिक्षेपहेतुरित्यर्थः ।। ४२ ॥ आदि ) होते हैं, अतः कोई अर्थक्रिया तो अवश्य है, तथापि कहींपर दोष या सामान्यज्ञानरूप अध्यासहेतुके उच्छेदरूप उपरामसे अथवा कहीं विशेषदर्शनप्रयुक्त अधिष्ठानके ज्ञानसे बाध हो जानेपर सब अर्थक्रियायें नहीं होती, ऐसा तत्त्वशुद्धिकार आदिका मत है ॥ ४०॥ ___ 'मिथ्यात्वम्' इत्यादि । पूर्वोक्त उपपादनसे वस्तुका मिथ्यात्व होनेपर भी अर्थक्रियाकी सिद्धि में कोई विरोध नहीं आता, अतः प्रपञ्चका मिथ्यात्व सिद्ध है। यहाँ माध्वमतानुयायी शङ्का करते हैं-यदि मिथ्यात्वको मिथ्या मानोगे, तो जगत्का सत्यत्व होगा और मिथ्यात्वको सत्य मानोगे, तो द्वैतापत्ति होनेसे अद्वैतकी हानि होगी यों उभयतःपाशा रज्जु होती है। इस शङ्काका अद्वैतदीपिकाकारके मतसे समाधान करते हैं ॥ ४१ ॥ 'स्वाश्रयसम०' इत्यादि । सर्वत्र धर्मोको अपने विरोधीका प्रतिक्षेप करनेमें धर्मिसमसत्ताकत्व ही नियामक है; इसमें पारमार्थिक होनेकी आवश्यकता नहीं रहती। व्यावहारिक घटत्वसे भी अघटत्वका प्रतिक्षेप होते देखा जाता है, अतः स्वाश्रय Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034618
Book TitleSiddhant Kalpvalli
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSadashivendra Saraswati
PublisherAchyut Granthmala
Publication Year1941
Total Pages136
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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