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________________ श्वेताम्बर तेरापंथ-मत समीक्षा । ७१ 协会分会协会分会会分会分会分会分会协会分设“长 केवली होगा। अब दिखलाइये, कहाँ रही भवकी परंपराका बढना ? । 'परित्तसंसारी' वगैरह विशेषण होनेसे भवकी परंपराका बढना बिलकुल असंभव है। अब जिनपूजा, भवपरंपरामें हितकर है, ऐसा कहोगे, तो बस, झघडा समाप्त हुआ। आप लोग भी सूर्याभदेवकी तरह जिनपूजा रोचक हो जाओ। अच्छा अब दूसरी बात देखिय, जैसे और वस्तुएं पूजी, वैसे जिनप्रतिमा भी पूजी, ऐसाभी तुम्हारा कथन ठीक नहीं है । क्योंकि-जिनपूजाकी तरह दूसरी वस्तुओंकी पूजाके समय 'आलोए पणामं करेइ' ऐसा कहा नहीं है । तथा जिन प्रतिमाकी तरह 'नमुत्थुणं' वगैरह कहा नहीं है। एवं हितकारी-मुखकारी-क्षेमकारी-कल्याणकारी वगैरह शब्द भी कहे नहीं हैं । तिसपर भी ३१ वस्तुओंकी पूजा तथा जिनेश्वरकी पूजाको एक समान गिनते हो, इससे उत्सूत्रभाषीपनेका दोष तुम्हारे सिरपर लगता है कि नहीं, इस बातका विचार करो। इसके सिवाय और भी देखो, भगवतीसूत्रके १० वे शतकके छठे उद्देशेमें पृष्ट ८७६ में कहा है कि भगवानकी दाढा वगैरहकी आशातना देवता लोग करते नहीं हैं । जब दाढाकी ही आशातना नहीं करते हैं, तो फिर प्रतिमाके लिये तो कहना ही क्या ? देखिये, वह पाठ यह है: ___पभू ए भंते ! चमरे असुरिंदै असुरकु. मारराया चमरचंचाएरायहाणीए सभाए सुहम्माए चमरंसि सीहासणंसि तुडिएणं सद्धिं दिव्वाइं भोग भोगाई भुंजमाणे विहरिचए ? यो बढे समहे। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034617
Book TitleShwetambar Terapanth Mat Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherHarshchandra Bhurabhai Shah
Publication Year1914
Total Pages98
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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