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________________ ( ६१ ) ....... सुनक्षत्रसर्वानुभूती अनगारौ मध्ये उत्तरं कुर्वाणौ तेन तेजोलेश्यया दग्धों स्वर्ग गतौ ... एवं च प्रभुणा यथास्थिते ऽमिहिते स दुरात्मा भगवदुपरि तेजोलेश्यां मुमोच सा च भगवन्तं त्रिः प्रदक्षि णीकृत्य गोशालकशरीरं प्रविष्टा तथा च दग्धशरीरो विविधां वेदनां अनुभूय सप्तमरात्रौ मृतः । " भावार्थ - तत्र भगवान महावीर स्वामीने आनन्दसे कहा कि तू गोतम गणधर आदि सब मुनियोंसे जाकर कह दे कि गोशाल यहां पर आरहा है सो कोई भी उसके साथ बात चीत न करे । समस्त, साधु इधर उधर चले जावें । आनंदने जाकर सबसे वैसा ही कह दिया > तदनन्तर वहां पर गोशाल आया । उसने आकर क्रोध से महावीरस्वामीसे कहा कि तुम मेरे लिये यह क्या कहते हो कि यह मंखली ग्वालेका पुत्र गोशाल है | गोशाल तो कभीका मरगया । मैं दूसरा ही हूँ । इस प्रकार भगवान महावीरका तिरस्कार होते देखकर सुनक्षत्र और सर्वानुभूति नामक साधुओंसे न रहा गया और उन्होंने उसको कुछ उत्तर दिया कि झट गोशालने उन दोनोंपर तेजोलेश्या चलाकर उन्हें वहीं पर उसी क्षण भष्भ कर दिया । तब फिर महावीर स्वामीने भी उससे कहा कि तु वह ही मेर शिष्य गोशाल है दूसरा कोई नहीं है । मेरे सामने तु नहीं छिप सकता । इस प्रकार अपनी सच्ची निन्दा सुनकर गोशालने महावीरस्वामी के ऊपर भी तेजोलेश्या चला दी । किन्तु तेजोलेश्या महावीरस्वामीकी तीन प्रदक्षिणा देकर उस गोशालके शरीर में ही घुस गई। जिससे वह जलकर सातवीं रात मर गया । परन्तु उस तेजो लेश्याकी गर्मीसे महावीर स्वामीको भी छह मास पेचिशके दस्त होते रहे । इस रोग को दूर करनेका वृत्तान्त भगवती सूत्रमें १२६७ वें से १२७२ वें तकके पृष्ठों पर यों लिखा है कि महावीर स्वामी के पित्तज्वर पीडित शरीरको देखकर सब साधु Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034616
Book TitleShwetambar Mat Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAjitkumar Shastri
PublisherBansidhar Pandit
Publication Year1930
Total Pages288
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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