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________________ ( ६० ) जला सके ) देखी जो कि उसने गोशालके ऊपर छोडी थी और महावीर स्वामीने उस तेजोलेश्या की अभिको अपनी छोडी हुई शीतलेश्यासे शांत कर दिया था । यह देखकर गोशालने महावीर स्वामीसे पूछा कि महाराज ! यह तेजोलेश्या कैसे सिद्ध होती है ? महावीर स्वामीने उसको तेजोलेश्या सिद्ध करनेकी विधि बता दी । तदनुसार गोशालने वह लेश्या सिद्ध भी कर ली । तेजोलेश्या सिद्ध हो जानेपर गोशाल महावीर स्वामी से अलग रहने लगा और अपने आपको " जिनेंद्र भगवान " कहने लगा । तथा अपने अनेक शिष्य भी उसने बना लिये । 1 महावीर स्वामीको जब केवलज्ञान हो गया तो वे एक दिन उस श्रावस्ती नगरी में आये जहां गोशाल ठहरा हुवा था । नगरी में गोशालको जनता के मुख से " जिनेन्द्र भगवान सुनकर महावीरस्वामी की सभा के लोगोंने महावीर स्वामीसे पूछा कि भगवन ! यहां दूसरा जिनेद्र भगवान् कौनसा आगया ? महावीर स्वामीने कहा कि मंखली वालेका पुत्र गोशाल मुझसे कुछ विद्या सीखकर व्यर्थ अपने आपको ' जिनेन्द्र ' कहकर यहां ठहरा महावीर स्वामी के मुख से निकली हुई यह बात गोशालने किसी मनुष्यसे सुनली । उसको अपनी निंदा सुनकर महावीर स्वामी के ऊपर बहुत क्रोध आया । उसने भोजनार्थ निकले हुए महावीर स्वामीके शिष्य " आनंद , नि से यों कहा कि आनंद ! महावीर स्वामीने मेरी निन्दा की है सो यह बात ठीक नहीं। तू जाकर अपने स्वामी से कह दे कि यदि दे मेरी निन्दा करेंगे तो मैं उनको जला दूंगा । हुआ है । आनंद मुनिने यह बात आकर महावीर स्वामी से कही । तदनंतर क्या हुआ उस वृत्तान्तको संस्कृत टीकाकारने कल्पसूत्र के वें पृष्ठ पर यों लिखा है. २४ ततो भगवता उक्तं भो आनन्द शीघ्रं त्वं गच्छ गौतमादीन् मुनीन् कथय यत एव गोशाल आगच्छति न केनाप्यस्य भाषणं कर्तव्यं इतस्ततः सर्वेपसरन्तु । भगवतिरस्कारं असहमानौ . ....... Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat ܙܐ www.umaragyanbhandar.com
SR No.034616
Book TitleShwetambar Mat Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAjitkumar Shastri
PublisherBansidhar Pandit
Publication Year1930
Total Pages288
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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