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________________ ( १९३ । अर्थात्-कुमुदचन्द्र तीसरी बार भी देवसूरिके कहे हुए प्रयोगको न समझकर अंटसंट तरहसे उसका खंडन करते हैं। देवमूरिः-अस्य भवद्भासितस्य अनवयोध एवोत्तरम् देवमूरि-न समझना ही आपके इस कहनेका उत्तर है। कुमुदचन्द्रः-लिख्यता कडिने प्रयोगः । अर्थात्- कुमुदचन्द्रने देवसूरिसे कहा कि आप पत्रपर अपना प्रयोग लिख दीजिये। देवमूरिः-सोऽयं गुरुशिष्यन्यायः । अर्थात्-देवसूरिने कहा कि लिखकर बतलाना गुरु शिष्यों के मध्य होता है। महर्षिः देव ! समाप्ता वादकथा, जितं श्वेतांवरेण, हारितं दिगबरेण, अतोप्यूर्ध्व विकथनं पराभूतजम्भारिसभे महाराजसदसि गोवधमनुबध्नाति । ___ महर्षि नामक सदस्यने कहा कि महाराज ! शास्त्रार्थ समाप्त हो गया श्वेतांवर पक्षकी विजय और दिगम्बर पक्षकी हार हो गई। अब इससे आगे इस शास्त्रार्थको चलाना आपकी सभामें गोवधका अनुकरण होगा। देवसरि:-[ अनुद्य तदुषणं च परिहत्य स्वपक्षं स्थापयन् कोटाकोटिशब्दं प्रयुक्रे ] अर्थात्--देवसरिने कुमुदचन्द्र के कथनका अनुवाद करके अपने ऊपर आये हुए दूषणको हटाकर तथा अपना पक्ष जमाते हुए कोटाकोटि शब्दका प्रयोग किया । कुमुदचन्द्रः-माः ! अपशब्दोऽयम् । यानी-कुमुदचन्द्रने कहा कि आपका कहा हुभा 'कोटाकोटि' शब्द अशुद्ध है। उत्साहः-अन्तरिक्षाम्बर ! मैवमाचक्षीथाः । कोटाकोटि कोटिकोटिः कोटीकोटिरिति त्रयः । शब्दाः साधुतया हन्त सम्मता: पाणिनेरमी । (इति पाणिनिप्रणीतसूत्रं व्याकरोति) Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034616
Book TitleShwetambar Mat Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAjitkumar Shastri
PublisherBansidhar Pandit
Publication Year1930
Total Pages288
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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