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________________ 606—666—***O***CoooCoooCoooOoooOo**Coo6C6000006 ८६ गौतमस्वामी गये मृगावतीके वहाँ, जब यही कहन 'भगवन् ! मुखको बांधो' ऐसा श्रीविपार्क में साफ कहा । बांधी हो, तो क्योंकर कहती ? इसमें कुछ न विचारा है, देखो ऐसे अजब मजबने, अपना जन्म गमाया है ॥ ८७ ओवश्यकर्मे विधि बतलाई, काउस्सग करनेकी, मुहपत्ती हाथमें कही है, फिर भी मुखको दे ताली । दशवैकालिक और अनेकों, सूत्रोंमें बतलाया है, देखो ऐसे अजब मजबने, अपना जन्म गमाया है । ८८ दंडा रखनेका दिखलाया, भगवत्यादि अनेकोंमें, फिर भी इसको नहीं ग्रहें, करते ऐसे सब बातों में । बात एक भी नहीं रखी, साधूका वेष लजाया है, देखो ऐसे अजब मजबने, अपना जन्म गमाया है ॥ ८९ सब चीजों को खानेवाले, बनकर बैठे बावाजी, 'खमा', 'पूज्यपरमेश्वर' में, हैं और बने पूरे काजी । वासि - विल और मधु - मक्खन भी, जो आया, सो खाया है, देखो ऐसे अजब मजबने, अपना जन्म गमाया है || ९० लाला कर, र्याएं देती हैं, जो हरदम रहती हैं, १ पृ. २२ । २ आवश्यकनियुक्ति में, काउस्सग के अधिकार में । ३ साध्वीएं। •C660000609 ( २१ ) Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat ***09660666066006660666066606600066066000. www.umaragyanbhandar.com
SR No.034608
Book TitleShiksha Shatak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherAbhaychand Bhagwan Gandhi
Publication Year1915
Total Pages28
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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