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________________ साध्वी व्याख्यान निर्णयः । वर्ग सुधरवानो संभव रहे । तेनी प्रजा पण बा होश बनशे जो आम थाय तो खरेखर भविष्य मां जैन समाज सारी पायरीए आवी शकशे अवी आशा राखवी अस्थाने नथीज। महासती पूज्य साध्वी जी महार जो, हवे आपणे समजवू घटे छे के गृहस्थाश्रम त्यागी साध्वी जीवन प्रात्म कल्याणार्थ ग्रहण कर्यु छे तो खाली जगनी जंजाल, आपस मां कुसम्प वधारी जीवन ने बरबाद करवू योग्य नथी, घर करी बैठेल प्रमाद ने तिलांजली आपी आत्म सन्मुख दृष्टि राखी, पोतार्नु अने परनु जीवन उज्वल बनावqए आपणी फरज छे ।जो आपणे आपणा पग ऊपर रही शु तो जे समाज ने आजे भारे पड़ता गणाइये छीर ते भार समाज उपर थी ओछो करी शकीशुं । अ पणा जगेर वर्त्तवानी समाजनी करड़ी दृष्टि थइ छे ते आपणा शुद्ध परिवर्तन थी मीठी दृष्टि थता वार नहीं लागे। आलेख द्वेष बुद्धि थी नथी लख्यो छतां कोई ने अघटित लागे तो क्षमा या छ। . परिशिष्ट नं. २ हमने जयपुर से ज्ञानसुन्दरजी के साथ पत्र व्यवहार किया पहले पत्र का जवाब तो शानसुन्दरजी ने दिया, दूसरे-तीसरे पत्र का जवाब नहीं दे सके-पत्रों की नकल नीचे लिखे मुजिब है। ज्ञानसुन्दरजी में कमजोरी व अन्याय ज्ञान सुन्दरजी को सूचना । ___ जब मैं फलौदी से विहार करता हुवा कापरड़ाजी तीर्थ में आपसे मिला था तब मैंने आपसे कहा था कि-खरतर गच्छ के विरुद्ध हमारे साधु साध्विगे विरुद्ध ट्रेक्ट और लेख जितने छपवाते हैं वो दूसरों को भेजते हैं परन्तु हमको तथा हमारे गच्छ के साधु और श्रावकों को नहीं भेजते है यह उचित नहीं है सब ट्रेक्ट मेरे को दो मैं उनका उचित जवाब दूंगा, उस पर आपने बतलाया कि-अभी मेरे पास नहीं है चौमासा में सा ट्रेक्ट अवश्य मेज दूंगा और साध्वी व्याख्यान संबंधी चर्चा का लेख भी भेज देने का मंजूर किया था वो आज तक नहीं भेजा, और अजमेर की दादाबाड़ी वाले लेख का समाधान करने बाबत आपने मेरे को कहा था तब उस पर मैंने आपले वायदा किया थाकि-मैं अजमेर जाकर देख कर लिखवाने वाले की तथा उसकी प्रेरणा से करने वालों की सलाह लेकर आपको खुलासा लिखूगा, इन तीन बातों का मेरे और आपके बीच में वायदा हुवा था उसके अनुसार मैंने जयपुर से आपको, फलौदी पत्र लिखा था, जिसकी नकल इस प्रकार है मणिसागर विनयसागर जयपुर । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034600
Book TitleSadhvi Vyakhyan Nirnay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManisagarsuri
PublisherHindi Jainagam Prakashak Sumati Karyalay
Publication Year1946
Total Pages64
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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