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________________ साध्वी व्याख्यान निर्णयः सुदुस्सहामि पीडापि न चिन्ल्या च पितुस्त्वया प्रहारात्र सहते किं जयश्री लंपटा भंटाः ॥ ९४ ॥ साधयन्तोऽथवा विद्यां नरा दुःखं सहति वै । सिद्धिरत्यद्भुतापेन बिना कष्ट न जायते ॥ ९५॥ तातपादानतानैव कर्तव्येति च नाऽधृतिः । जनकाराथनासक्तो यत्वं प्रागधुनापि च ॥ ९६ ॥ ताद्वमुंच पितुः शोकं परिभावय संमृति । परित्राणं न शोकेन किंचिद्भव ते देहिनां ॥ ९७ ॥ भवं दुःखालयं वृद्धि संगमं स्वप्न सन्निर्भ । लक्ष्मीं विद्युल्लतालाल जीवितं बुदबुदोपमं ॥ ९८ ॥ यदि युष्मादशीप्येव गुरुशिक्षाविचक्षणः । शोकं कुर्वन्ति तद्वै विवेक्रोऽपि क यास्यति ॥ ९९ ॥ एवं धर्मोपदेशैः स नरेन्द्रो बोधितस्तया । • संविभोगतशोकश्व लग्नोधर्मे विशेषतः ॥ १ ॥ नित्यं महत्तरापादान् वन्दतेस्म नरेश्वरः । उपदेशान शृणोतिस्म शासनोदय कारिणः ॥ २ ॥ २३ PDR k 66 ३६-इस उपर के पाठ का भावार्थ श्री कान्तिविजयजी का बनाया हुआ श्री महाबल मलयसुंदरीरास " जो कि श्रावक भीमसीह माणेक द्वारा प्रकाशित हुआ है। उसकी मुद्रित पुस्तक के पृष्ठ ३१३-३१४ में ऐसा पाठ है || ढाल ॥ सडतीसमी || हूँ दासी राम तुम्हारी ए देशी ॥ एहवे निर्मल चरित पवित्ता, सत्य शील संतोष विचित्ता । पाती व्रत एकचित्ता, साध्वी मलवा तप, जुता ॥ होराज ॥ १ ॥ महासती धुर सोहे, श्रुतधर्मे भवि पडिवोहे ॥ होराज || म० ॥ एकादश अंगनी जाण, पामी शुभ अवधिनाण भावंती थिर पाण, संयम तत्र योग विहाण | दोराज ॥२॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034600
Book TitleSadhvi Vyakhyan Nirnay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManisagarsuri
PublisherHindi Jainagam Prakashak Sumati Karyalay
Publication Year1946
Total Pages64
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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