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________________ [ ६ ] रघुनाथजीके पास जाकर उनसे मिल गये । इत्यादि कह कर वक्तोजीने भीषणजीका मन फिरा दिया । अत्र भीषणजीकी श्रद्धा फिर पूर्ववत् ज्यों की त्यों हो गई। पश्चात दो तीन मासके बाद भीषणजी पूज्य श्री रघुनाथजी महाराजके पास आये | और पूज्य श्री ने फिर उनका आहार अलग कर दिया। इसके बाद भीषण भी पूज्य श्री रघुनाथजी महाराजके गुरुभाई पूज्य श्री जयमलजी महाराजके पास चले गये। इसी कारण पूज्य श्री रघुनाथजी महाराज और जयमलजी महाराजमें मतभेद उत्पन्न हुआ और छः मास तक यह झंझट चलता रहा परन्तु भोषणजीने अपना मत नहीं छोड़ा । इसके अनन्तर श्री रघुनाथजी महाराजने गोशालकका दृष्टान्त देकर वगडी गांव में सम्वत् १८१५ चैत्र सुदी नवमी शुक्रवार के रोज भीषगजीको गच्छसे अलग कर दिया । पश्चात् भीषणजी, वक्तोजी, रूपचन्दजी, भारमलजी और गिरिधरजी आदि तेरह जनोंने मिल कर नवीन पन्थ चलाया । तेरह जनोंने इसे चलाया था इसलिये अपने मतका प्रचार 1 और शास्त्रमें जहां इसका नाम 'तेरइ पन्थ' हुआ। ये लोग प्रत्येक ग्रामोंमें घूम घूम कर करने लगे । ओर शास्त्रके ६५ बोलोंका अर्थ उलट पुलट कर दिया। जहां जीव रक्षा करनेका पाठ देखा उसके अर्थ फेर दिये। इन लोगोंने यह प्ररूपणा की थी कि जीव रक्षा आदि करनेमें कोई लाभ नहीं है। ये सब सांसारिक क. हैं। पहले पूज्य श्री रघुनाथजी महाराजने भोषगजीको समझाया था कि भगवती सूत्र के पन्द्रहवें शतक में गोशालकको वैश्यायन वाल तपस्वी तेजो लेश्याके द्वारा जला रहा था वहां भगवन् महावीर स्वामीने अनुकम्पा करके शीतल लेश्याके द्वारा गोशालक को बचाया था । इस लिये सिद्धान्त में अनुकम्पा करना परम धर्म माना है उसको तुमने क्यों उठाया है । यह सुन कर भीषणजीने कहा कि वीर समझदार होते तो छद्मस्थपनेमें गोशास्टकको दीक्षा क्यों देते, गोशालकको तिल क्यों बताते। वह तिल नहीं बताते तो गोशाएक उसे क्यों उखाड़ फेंकता । तथा वीर गोशालकको तेजो लेश्या क्यों सिखाते। इस तेजोलेश्या के सिखानेसे गोशालकने सुनक्षत्र और सर्वानुभूतिको जला दिया तथा स्वयं arrat भी उस तेजोलेश्या के तापसे छः महीने तक रक्त व्याधि भोगनी पड़ी थी। इत्यादि बहुत से अनर्थ हुए। यदि वीर समझदार होते तो ऐसा अनर्थकर कार्य क्यों करते । किन्तु वीर चूक गये, उनमें छः लेश्यायें और आठ कर्म थे । यह हठ पकड़ कर भीषणजीने वीर भगवान् के प्रति बहुत कुछ अवर्ण वाद कहा। इसके अनन्तर फिर गुरुने समझाया कि तीर्थकर नीच कुलमें उत्पन्न नहीं होते और उनका गर्भापहार नहीं होता तथा केवल ज्ञान होने पर उनको उत्कृष्ट रक्त व्याधि Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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