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________________ विनयाधिकारः। ३९३ यदि कहो कि "अरिहंत, सिद्ध और भगवान महावीर स्वामीको नमस्कार तो उन्होंने मोक्षार्थ किया और अम्बडजीको लोक रीतिके अनुसार किया" तो इसमें कोई प्रमाण नहीं है बल्कि अरिहंत सिद्ध और महावीर स्वामीके साथ ही अम्वडजीका पाठ आनेसे उनका नमस्कार भी मोक्षार्थ ही सिद्ध होता है लौकिक रीतिके पालनार्थ नहीं । ____ तथा अम्बडजीके शिष्य उस समय संथारा पर बैठे हुए थे वहां लौकिक रीतिके पालनका प्रसंग नहीं था। उस समय लोकोत्तर रीतिके पालनका प्रसंग था तदनुसार ही उन्होंने अरिहंत सिद्ध और भगवान् महावीरको तथा अम्बड़जीको भी नमस्कार किया था । अतः अरिहंत आदिके नमस्कारको धर्मका अंग मानना और अम्बडजीके नमस्कारको धर्मसे बाहर कायम करना अज्ञान है। इस पाठमें अम्वडजीके लिये परिव्राजक पदका प्रयोग देख कर सन्यास धर्मके नातेसे अम्वडजीको नमस्कार करनेकी कल्पना करना भी मिथ्या है क्योंकि इस पाठमें साफ साफ शिष्योंने कहा है कि जिनके पास हमने स्थूल प्राणातिपात यावत् स्थूल परिग्रहका प्रत्याख्यान किया था उस सम्वडजीको नमस्कार है। यदि सन्यास धर्म के सम्बन्धसे शिष्योंने नमस्कार किया होता तो यहां वे प्राणातिपात मादिके प्रत्याख्यान का उपकार क्यों बतलाते बल्कि यह कहते कि जिस अम्वडजीसे हमने सन्यास धर्म ग्रहण किया था उनको मेरा नमस्कार हो । यहां मूल पाठमें साफ साफ बारह व्रत धारण करानेका उपकार मान कर ही अम्वनीको शिष्योंके द्वारा नमस्कार किये जानेका कथन है परन्तु सन्यास धर्मका उपदेशक गुरु मानकर अम्वडजीको नमस्कार करनेका कथन नहीं है । अतः इस पाठमें अम्वडजीके लिये परिव्राजक पदका प्रयोग देख कर सन्यास धर्मके सम्बन्धानुसार उनके शिष्योंका नमस्कार बतलाना अज्ञान है। यदि कोई कहे कि “अम्वलजीके शिष्योंने सन्यास धर्माके सम्बन्धानुसार यदि अम्वडजीको नमस्कार नहीं किया था तो यहां मूल पाठमें उन्होंने अम्बडजीके लिये श्रमणोपासक ऐसा विशेषण क्यों नहीं लगाया ?" तो इसका उत्तर यह है कि "जिन" धर्म का महत्व प्रकट करनेके लिये शास्त्रमें जगह जगह अम्वडजीके लिये "श्रमणोपासक" यह विशेषण नहीं लगाकर परिव्राजक यह विशेषण ही लगाया है सदनुसार यहां भी श्रमणोपासक ऐसा नहीं कह कर परिव्राजक ही कहा है क्योंकि इस विशेषणसे शीघ्र ही यह बात बुद्धिगोचर हो जाती है कि सन्यास धर्मकी अपेक्षासे श्रमणोपासकोंका धर्म भी श्रेष्ठ है अतएव अम्बडजीने सन्यास धर्मका परित्याग करके श्रावक धर्मको स्वीकार किया था अन्यथा शास्त्र में जो अम्वडजीके लिये परिव्राजक पद दिया है वह सर्वथा असंगत ठहरेगा क्योंकि जिस समय अम्वडजीके शिष्योंने संथारा पर बैठ कर अम्बड़ ५० Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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