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________________ अनुकम्पाधिकारः। २४९ द्रव्य देकर जीव छुड़ानेको एकान्त पाप सिद्ध करनेके लिए, व्यभिचार कराकर जीव छुड़ानेवाली वेश्याका दृष्टान्त देना भी भीषणजीका अज्ञान है । परोपकारार्थ अपने धनका खर्च करना, धनसे अपनी मोह तृष्णा और ममताको घटाना है और व्यभिचार सेवन करना, अपना मोह और तृष्णाको बढ़ाना है इसलिए ये दोनों बातें प्रकाश और अन्धकारकी तरह परस्पर एक दूसरेसे बिलकुल विपरीत हैं इन्हें एक समान मान कर परोपकारार्थ धन देनेवाले और व्यभिचार कराकर जीव रक्षा करनेवाले इन दोनोंको एक समान पापी बताना भीषणजीका अज्ञान है।। इस विषयको साफ करने के लिए भीषगजीके दिये हुए दृष्टान्तके समान ही एक दृष्टान्त दिता जाता है। मान लीजिए कि भीषणजीके पाटानुपाटपर बैठे हुए पूज्यजीका दर्शन करनेके के लिए दो गरीब स्त्रियां दूर देशसे आई, उनसे पूज्य जीने पूछा कि “तुम लोगोंने इतने दूर स्थान पर आनेके लिये द्रव्य आदि किस प्रकार प्राप्त किये हैं।" यह सुन कर एकने उत्तर दिया कि "मैंने अपने जेवरों को बेंच कर आपके दर्शनार्थ द्रव्य प्राप्त किया है" दूसरीने कहा कि "मैंने व्यभिचार करा कर द्रव्य प्राप्त किया है और उस द्रव्यसे आप के पास आई हूं।" वहां कोई मध्यस्थ सम्यग्दृष्टि श्रावक बैठा हुआ था उसने पूज्यजीसे पूछा कि "इन दोनों स्त्रियोंमेंसे कौनसी धार्मिक और कौन पापिनी है ?" इसके उत्तरमें भ्रमविध्वंसनकारके मतानुयायी पूज्यजी यह तो नहीं कह सकते कि “ये दोनों स्त्रियां एक समान ही धार्मिक हैं" किन्तु लाचार होकर उन्हें कहना ही पड़ेगा कि “जिसने जेवर बेंच कर दर्शनका लाम किया है वह स्त्रो धार्मिक है और जिसने व्यभिचार करा कर द्रव्य प्राप्त किया है वह धमको लज्जित करने वाली दुराचारिणी है साधुके दशनसे उत्पन्न होने वाला धर्म उसे नहीं हो सकता । ऐसी दुष्टा स्त्रियोंका साधु दर्शन का नाम लेना दम्भ है।" ___ यह सुन कर प्रश्नकर्ताने कहा कि “एकने तो पांचवें आस्रवका सेवन किया है और दूसरीने चौथे आस्रवका सेवन किया है फिर इन दोनोंको आप एक समान ही क्यों नहीं मानते ? जिसने पांचवें आस्रवका सेवन करके आपके दर्शनका लाभ किया है उसे धार्मिक और चौथे आस्रवका सेवन करके आपके दर्शनका लाभ उठाने वालीको आप पापिनी क्यों कहते हैं ?" इसके उत्तरमें उनके पूज्यजीको यह कहना ही पड़ेगा कि जिसने साधु दर्शनार्थ अपना जेवर वेंचा है उसने शृङ्गार और द्रव्यसे अपना ममत्व हटाया है और गहना बेंचनेसे उसके चारित्रमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं हुई है। अतः वह धार्मिक है। परन्तु Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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